मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

"आखिरी बार !"

आखिरकार
 डरी हुई
 नवजात  चिड़िया की तरह
 होंठ हिलाते हुए
 दादी ने अपनी
 झुरी भरी हथेलियाँ
 हवा में  फैला दी थी
 पर कोंन देखता?
 अखबारों में उलझे
 चाय की चुस्कियां लेते
 इधर उधर
 समूह में बतियाते
 शादी में आये लोग
 गपशप में
 व्यस्त  थे
 बाहर हलवाई से
  बड़े काका
  बहस कर रहे थे
 और काकी
 मेहँदी का कटोरा थामे
 पूँछ कटी छिपकली सी
 खिसक गयी थी
 भाई- भाभी, नन्द- देवर और
 हुल्लड़ मचाते युवा, बच्चे
 बेमतलब   यहाँ से वहाँ
 व्यस्त दिखने की
 कोशिश में भाग रहे थे
 ताई अब भी
 नायन काकी से
 अपने गुजरे ज़माने  का
 इतिहास दोहरा रही थी
 माँ समर्थन में
 सिर हिलाती
 उबटन  घोलती
 धीरे धीरे
 गणेशजी के
 गीत गा रही थी
 बाहर ढोलक की थाप पर
 मोहल्ले की लड़कियों की
 बन्नी-बन्ना  गाती
 मिली जुली  आवाजे
 घर में हवा की
 परियों के  साथ
 लहरा रहीं थी
 उधर पिता ताऊ जी के साथ
 बैंक जाने को तैयार थे
 सुबह धीरे धीरे सरक रही थी
 कोने में बैठी बन्नी उठी
और दादी की झुरियों भरी
 हथालियों को थाम बोली
 "अम्मा कुछ चाहिए"
 धुंधली आँखों से
 पोती को टटोलती
 दादी ने रुंधे गले से  कहा
 "गुसलखाने ले चल बिट्टो
  बस आखिरी बार "!

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