सोमवार, 16 नवंबर 2015

मेरी कुछ कविताएं


  
डॉ सरस्वती माथुर

"मैं जीना चाहती हूँ !"
एक गिलहरी की तरह
कभी कभी मैं
कुतरती हूँ
 अपना वक्त
जो घसियारे सा
काटता रहता है मुझको
और बंद रखता है
देह पिंजरे में रूह  को
मैं खोलना चाहती हूँ
इस देह का पिंजरा
 ताकि उड सकूँ
रात में सपने का
बुक्कल पहन
सुदूर आसमान में
 और फिर भोर होते ही
 लौट आऊँ
देह के पिंजरे में
क्यूंकि मैं जीना चाहती हूँ
फूलों के रंगों के साथ
बसंत के मौसम के साथ
चाँद तारों की  रात के संग
भिनसारे में चहकती
चिड़िया के संग
मैं देखना चाहती हूँ
उगते सूरज के संग
उगती सिंदूरी लाली 
जो ओढ़े रहती है
सिंदूरी पल जब वो
सागर का चुंबन कर
धूप के मोती लुटाती है  
मैं जीना चाहती हूँ
तितलियों के संग
जो फूलों पर उड
उनसे मकरंद चुराती है
मैं डूबी रहना चाहती हूँ
रिश्तों की चाँदनी में
और थोड़ा- थोड़ा
 छूट जाना चाहती हूँ
सभी  अपनों  के दिल में
धड़कन की  तरह !
डॉ सरस्वती माथुर
2
"बीज़ हूँ मैं !"
बीज़ हूँ मैं
वहीं उगी
जहां गिरी थी
कच्चा पौधा जब उगा
तो बहुत मुलायम था  
हरा था 
हर पौधे और
फूल का
 होता है अपना रंग
उसके बढ्ने की विधि
 मेरा भी एक रंग था
 विकास की प्रक्रिया थी
 सो बढ़ती रही
 पौध से पेड़ बनी
 शाखाओं सी फैली
 पातों ने
 हवाओं से सोखीं
रसभीगी नमी
मेरे तने को दी
 एक मजबूत जमीं
यहीं फैलूँगी अब
फल दूँगी और
बीज़ बन कर
बार बार उगूँगी
बस मेरी इस माटी को
उर्वर रहने देना
बस उर्वर रहने देना
डॉ सरस्वती माथुर
 "नीम खामोशी में !"
मैं फिर चढ़ूँगी
उगते सूरज सी
 सपनों के पहाड़ों पर
 मौसम  की
अनमन हवाओं में
 और धूप बन
 झरती रहूँगी
 हर मौसम में
 बस चौमासे में
 निरंतर न
आ पाऊँगी क्यूंकी
तब बादलों का
 साथ निभाऊँगी
 हाँ संध्या में
चाँदनी बन चाँद संग
 हवाओं की सरगम में
 नए गीत
 गुनगुनाऊँगी और
 फूलों से रंग चुरा के
 तितली  बन
बसंत के मौसम में
रसपगी रागिनी छेड
 नूपुर सी बज़
पतों -शाखों में समाकर
 हरियाली बन जाऊँगी
 पर तब तक मुझे
 अन्तर्मन की
 नींद  नदी में
 ख्वाब बन कर बहने दो
अपने ही मन की
 नीम खामोशी में
कैद रहने दो !
डॉ सरस्वती माथुर
क्षणिकायेँ 
1)
नि:शब्द मन
कितना कुछ कहता है
बिलकुल वैसे ही
 जैसे मौन पहाड़ से
निकल कर झरना
हाहाकार मचाता
जाने क्यों
बिखरी धुंध की
बुक्कल ओढ़
नदी से मिल
कलकल रोता है l
2)
अलाव सा
कभी कभी हो जाता है
मन हुमारा
जलता- बुझता
सर्द मौसम में
ताप भरता
फिर ठंडा हो 
राख़ हो जाता है 
कभी कभी उड  
जज्बाती हवाओं में
बिखर खो जाता है l
3 )
अब पहचान के
रंगीन दायरे
बहुत सिमट गये हैं
सम्बोधन के
 मीठे चिरौरी से
शहदीले  शब्द भी
मुखर नहीं रहे
जाने क्यों
प्रीत प्रेम के रंग
अब चढ़ते नहीं
शायद रंगने वाले
अब रंगरेज़ नहीं रहे l
4)
पहचानने लगी हूँ
अब उन लोगों को
जो शब्दों से
बिछाते हैं
परिचय  का बिछौना और
मौसम बदलते ही
विश्वास का चेहरा
बदल लेते हैं !
5 )
पीले पन्नों पर
धुंधले पड गये
चिट्ठियों के अक्षर
पर उन यादों का
क्या करूँ जो
वक्त के साथ
गहरी होती जाती है l
डॉ सरस्वती माथुर
.................................................................................................... 
परिचय :
नाम : डॉ सरस्वती माथुर
शिक्षाविद एवम सोशल एक्टिविस्ट ,कवियत्री-लेखिका - साहित्यकारव हाइकुकार
साहित्य :देश की साहित्यिक पत्रिकाओं में कवितायेँ ,कहानियां ,आलेख एवम नये नारी सरोकारों पर प्रकाशन
प्रकाशन ४ कृतियाँ प्रकाशित व साझा संकलन में कवितायें ,हाइकु संकलित
काव्य  संग्रह :दो
1॰एक यात्रा के बाद
2.मेरी अभिव्यक्तियाँ
जयपुर विगत कई वर्षों से निरंतर लेखन। कविता, कहानी, पत्रकारिता, समीक्षा, फ़ीचर लेखन के साथ-साथ समाज साहित्य एवं संस्कृति पर देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन।
शिक्षा व सामाजिक सरोकारों में योगदान, साहित्यिक गोष्ठियों व सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी, विभिन्न साहित्यिक एवं शिक्षा संस्थाओं से संबद्ध, ऑथर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया, पब्लिक रिलेशंस सोसाइटी ऑफ़ इंडिया राजस्थान चैप्टर की सदस्य।
संपर्क
:ए -२ ,सिविल लाइन
जयपुर -6
............................................................................................................................................................................................................................................................... 

डॉ सरस्वती माथुर.
 कविता क्या है मेरे लिये ....

मेरे लिये जीवन ह़ी कविता है ,कविता ह़ी जीवन है l कविता की लाखों परिभाषाएं हैं क्युंकि उसके आयाम अनेकों हैं, नींद में साँस चल रही है वह भी लयात्मक कविता है , जहाँ गति है वहाँ कविता है ...कविता एक साधना है, भावना हैl कविता ... सृष्टि ,देश, समाज, परिवार, प्रकृति ,अहसास- अनुभूति और अभिव्यक्ति का कलात्मक आकलन है, साक्षात् इश्वर से बातचीत का
माध्यम है ! शायद इसलिए मेरी अभिव्यक्ति कि केंद्रीय विधा भी कविता ह़ी है .
 नाम : डॉ सरस्वती माथुर
परिचय :
 :शिक्षाविद , कवयित्री,लेखिका सोशल एक्टिविस्ट
शिक्षा : एम.एस .सी (प्राणिशास्त्र ) पीएच .डी
,पी. जी .डिप्लोमा इन जर्नालिस्म ( गोल्ड मेडलिस्ट )
प्रकाशन
कृतियाँ :
काव्य संग्रह : एक यात्रा के बाद
                     मेरी अभिव्यक्तियाँ
,

मोनोग्राम : राजस्थान के स्वतंत्रता सेनानी : मोनोग्राम हरिदेव जोशी
विज्ञान :
 जैवप्रोधोयोगिकी 
( Biotechnology पुरूस्कार /सम्मान :
प्राप्त पुरस्कार / सम्मान: दिल्ली प्रेस द्वारा कहानी " बुढ़ापा "पुरुस्कृत १९७० में एवं अन्य पुरस्कार 
भारतीय साहित्य संस्थान म.प्र .द्वारा काव्य में बेस्ट कविता के लिये
Felicitation & अवार्ड given by Association ऑफ़ : डिस्ट्रिक्ट झालावाड द्वारा साहित्य में योगदान के लिये !
जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल  के कवितानामा में भागीदारी
काव्य व हिन्दी को बढ़ावा देने के लिए परिकल्पना सार्क शिखर सम्मान से सम्मानित
विगत कई वर्षों से निरंतर लेखन। कविता, कहानी, पत्रकारिता, समीक्षा, फ़ीचर लेखन के साथ-साथ समाज साहित्य एवं संस्कृति पर देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन।
शिक्षा व सामाजिक सरोकारों में योगदान, 
दूरदर्शन- आकाशवाणी ,साहित्यिक गोष्ठियों व सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी, विभिन्न साहित्यिक एवं शिक्षा संस्थाओं से संबद्ध, ऑथर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया, पब्लिक रिलेशंस सोसाइटी ऑफ़ इंडिया राजस्थान चैप्टर की सदस्य।पीआरसीआई वुमेन विंग ) की फॉर्मर चेयरपर्सन   ,गिल्ड ऑफ वुमेन अचिवर्स की स्रजस्थन प्रतिनिधि !
संपर्क:
नाम : डॉ सरस्वती माथुर
ए---२ , हवा सड़क ,सिविल लाइन ,जयपुर-६
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.नाम : डॉ सरस्वती माथुर
ऍम .एस.सी ,पी .एच. डी)
जन्मतिथि: 5 अगस्त
शिक्षाविद एवम सोशल एक्टिविस्ट
साहित्य :देश की साहित्यिक पत्रिकाओं में कवितायेँ ,कहानियां ,आलेख एवम नये नारी सरोकारों पर प्रकाशन
प्रकाशन ४ कृतियाँ प्रकाशित
संपर्क :ए -२ ,सिविल लाइन
जयपुर विगत कई वर्षों से निरंतर लेखन। कविता, कहानी, पत्रकारिता, समीक्षा, फ़ीचर लेखन के साथ-साथ समाज साहित्य एवं संस्कृति पर देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन।
शिक्षा व सामाजिक सरोकारों में योगदान, साहित्यिक गोष्ठियों व सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी, विभिन्न साहित्यिक एवं शिक्षा संस्थाओं से संबद्ध, ऑथर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया, पब्लिक रिलेशंस सोसाइटी ऑफ़ इंडिया राजस्थान चैप्टर की सदस्य।...
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मंगलवार, 10 नवंबर 2015

जलता दीप/ शुभ दीपावलीआई

"जलता दीप!"
कौन कहता है
मेरी देहरी पर
जलता दीप
आँधी तूफानों से
लड़ता नहीं है
वह जलता है
रिसता है फिर
कशमकश के बाद
बुझता है
तलवार सी
जलते दीप की लौ को
कई बार मैने
वार करते देखा है
विश्वासों की बाती को
लड़ते देखा है
रात भर जुगनू सा
उड़ते देखा है
कतरा कतरा तेल में
सिकुड़ते देखा है
परिशून्य में अन्त तक
दीप के जादुई
सम्मोहन को
तब तक कंपकंपाते
थरथराते देखा है
जब तक भोर की
पहली किरणे
अपनी झीनी रोशनी मेँ
सुरक्षा कवच तोड
कालिमा की सियाही को
चौखट पर दर्प से उगते
सूरज की वेदी पर
समाहित कर 
उसके अस्तित्व मेँ ख़ुद
समर्पित नहीं हो जाती
तब तक दीप को
 मैने जलते देखा है!
2
"शुभ दिवाली आई !"
तिमिर मिटाने
लड़ियाँ दीपों की सजी
शुभ दीवाली आई
चहुं दिशाएँ
जगमग चमकी
रातरानी दहकाईं

आँगन चौबारों में
रँगोली थापी
अमृत बरसाती रातें
पटाखों से काँपी
पावन धरा पर
माँ  लक्ष्मी  मुस्कुराईं

बंदनवारों से
घर देहरी लहकीं
जयोतिमय फुलझडियां
चिडचिड करती चहकीं
समता सदभाव करूणा की
अनुपम ज्योत झिलमिलाई।
डाँ सरस्वती माथुर ।


बुधवार, 4 नवंबर 2015

मेरी कविता...."रेत के घरोंदे!"

हमेशा ही
कमजोर नहीं होते
 रेत के घरोंदे
देखती हूँ कई बार
बेलागाम दौड़ती
समुंद्री लहरे भी
उन्हे नहीं ढहा पातीं
कैसे ढहातीं
वो तो  धीरे  धीरे
मजबूत हुआ था
उसकी दीवारों के
 इर्द गिर्द समय ने
विश्वास की पथरीली
 बाड़ लगा दी थी
जिसे रोज समय
विश्वास की अपनी
 मुस्कराहट की
धूप से सींचता था
चाँद अपनी चाँदनी संग
वहाँ बैठ घंंटों
 बतियाता था क्योंकि
हवाएँ वहाँ रोज
नए सपने बुनती थीं
और ममत्व भरी
रात वहाँ सितारों के साथ
जगराता करती थी
 फेन अपने चिलमन से
ढक उसे रोज
संवारती थी और
बहुत सी समुंद्री चिड़ियाएँ
वहाँ अपने पंख खोल
चक्कर लगाती थी
वहीं इस घरोंदे के पास
अशब्द गूंगे
 पत्थरों ने शिवालया
उकेर दिया था
और जल ने अपना
 नमक बिखेर कर
मिथकों को कैद में
बांध कर एक
नाम दिया था
यह रेत का घरौंदा
सभी के लिए अपने
मौन को मुखर करने का
माध्यम था क्योंकि
यह प्रेम का द्वीप था l
डॉ सरस्वती माथुर
15.6.15 को रची

सोमवार, 2 नवंबर 2015

सेदोका....२।११।१५

सेदोका
1.
मन लहरें
उठती गिरती हैं
सुधियों के सागर
बूंदें बन के
सीपियों के खोल में
मोती सी ढलती हैं l
2
परिक्रमा की
सूर्य ने धरती पे
समूचे क्षितिज पे
धूप चमकी
नए नए रंगों से
धरती भी दमकी l
3
रतजगा था
चाँद का गगन में
उनींदी हो चाँदनी
भोर हुई तो
धूप सेज सज़ा के
सागर में जा सोयी l
4
गीत गाती है
बहना चाहती है
नदिया कलकल
दूर जाती है
समुन्द्र में समा के
 गहरी थाह पाती l
5
सूर्य का घोडा
 हिनहिनाते हुए
धूप के पीछे दौड़ा
 धरा  को छूके
 धूप कूदी सिंधु में
  छिपी क्षितिज  पार l
6
 गुडीमुडी सी
हवाओं नें जगाया
तो कुलबुला कर
 तरु पे बैठे
पंछियों के झुंड भी
घोंसलों से निकले l

डॉ सरस्वती माथुर


क्षणिकाएँ.... नयी रचनाएँ !

मैं उदास थी
खामोश रात थी
देर तक चाँद से
बतियाती रही
मन की अनकही बातें
दोस्त मान उसे
सुनाती रही

मुझे  लगा
चाँदनी ने ओस सा
भीगापन टपका कर
उस रतजगे पर
अपनी मोहर लगा दी
और मुझे लगा
मैं अपनी भावनाओं की
वसीयत बना
उसे सौंप दी है
सुरक्षित रखने को l
17.3.15)

2
कभी कभी
घायल पाखी सी
रात भी छटपटाती  है
अमावस पे मौन हो
वो दर्द से कराहती है
बिना चाँद चाँदनी के
सुबह होने पर
उसकी सांसें तन्हाई केउसे सौंप दी है
समुन्द्र में डूब जाती है
देर तक अकेलेपन की
किरचियाँ जलपाखी सी
तिरती रहती है

जब फिर लौट के
 आता है चाँद तो
रात के गले लग
 पूरे आकाश में
बुनता रहता है
जुदाई के अनकहे
लम्हों को रिश्तों के
यह अलाव पूनम तक
जलते रहते हैं
उनके पाक रिश्तों की
 कहानी कहते हैं l
3

"बांस हूँ मैं !"
अभिनंदन करो
मेरे अस्तित्व को
रंगों से भरो
 मेरा मौन
 मेरा दर्शन है
राग रागिनी का
अद्भुत संगम है

मेरी खोखल का शून्य
बांसुरी बन जाता है
मेरे मौन को वाणी देता है
चिंतन करो
मुझे ना काटो
 हरीतिमा भर
मेरी डाली बन
जंगल में
मंगल  कर डालो

कोयल जब
मेरे झुरमुट में
आकर बोलती है
मेरी वर्णमाला में
रंग भर देती है
मुझे ना छाँटो
हवा ,धूप ,रंग
निरंतर बदल रहे हैं
 पुराने गांवों में
आज भी मैं
 झोंपड़ी का बाड़ा हूँ
पशुओं का भी मैं
मनपसंद चारा हूँ

बांस हूँ मैं
मुझे ना बांटो न
कृषक ,श्रमिक
व लेखकों का
चिरसखा हूँ
नहीं मैं बंजारा हूँ
 मुझे सँवारो
 जंगल की
 जीवनदायिनी
 सांस हू मैं !
डॉ सरस्वती माथुर




दीपावली पर रचनाएँ ---1 .11.15


"लक्ष्मी का आवाहन !"
घर पावन मन भी पावन 
दीप ज्योति लगती मनभावन 
 

रोशनी की नदी
चहुं ओर बह रही
मन मंदिर बन गया
जन जन से कह रही


लक्ष्मी माँ का आवाहन
दीप ज्योति लगती मनभावन
पूजा थाल में
मेवे संग मिठाई है
अनार पटाखों की गूंज
चहुं ओर छाई है


द्वार पर बंदनवार सुहावन
दीप ज्योति लगती मनभावन
डॉ सरस्वती माथुर


माहिया
ज्योति की बंदनवार
तुम कब आओगे
सजन जी मेरे द्वार l

देहरी दीपक जला
मन के आँगन से
अमावस का तम ढला

है दीप संग बाती
आई दिवाली
यादें तेरी आती l

है प्रेम दीप जलता  
सपनों का  सजना
 नैनो में आ मिलता  l
मुक्तक
लड़ियों के हैं हार
दीप पर्व तैयार
जन जन पे छाया
सज़ा घर परिवार
................................
हाइकु
दीपमालिके
अन्तर्मन में जल
तम हरती l

धरा पे  बहे
मावस की रात को
दीप झरने l

बाती जलती
पंक्तिबद्ध दीपों को
पूनम करतीl

अंधेरा गले
दीप से दीप जब
संग में जले l

दीपों की चाह
अंधेरा चीर
बनाना राह l

दीप के हार
रोशनी की लड़ियाँ
आँगन द्वार l

बाती सा प्रेम
मन दिये में रख
जलाना होगा।
.........
"दीवाली शुभ आई!"
....तिमिर मिटाने
सजी लड़ियाँ दीपों की 
दीवाली शुभ आई
चहुं दिशाएँ 
जगमग चमकी
रातरानी लहराई

आँगन चौबारों में
रँगोली थापी
पटाखों से रातें काँपी 
अमृत बरसाती 
पावन धरा पर 
लक्ष्मी माता मुस्कुराईं

बंदनवारों से 
घर देहरी हल्की
जयोतिमय फुलझडियां 
चिडचिड करती चहकीं
समता सदभाव । करूणा की
अनुपम ज्योत झिलमिलाई।

........
.सेदोका
1
दीप प्रेम का
विश्वास की  बाती से
जला के रख दिया
मन के द्वारे
रोशन हो चमके
घर आँगन द्वारे l
2
 मावसी रात
 घर आँगन द्वार 
ज्योतिर्मय कर
तिमिर हरा
आस्था की बाती जला
दीप में तेल भरा l
3
तांका
घर में जले
जब दीप माटी के
अन्तर्मन का
तिमिर भी भागा
सद्भाव की बाती से

........................................
गीत
"जल रे दीप जल !"

 बाती  को बांध कर
 जल रे दीप जल

 कभी ना छाने पाये
 कालिमा का पाखंड
आँधी तूफानो में भी
लौ को रखना अखंड

करना नहीं छल
जल रे  दीप जल

सद्भाव की बांध डोरी
बंदनवार सजाना
बन चाँद की चकोरी 
मंगलदीप जलाना

मिलेगा मन को बल
जल रे दीप जल l
डॉ सरस्वती माथुर
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
कविता
आज भी मिलता है
राम को वनवास
पर वो दिखता नहीं है


सच के राम हारते भी हैं
विश्वास के कुंभकरण
कहाँ समय से  जागते हैं?
 लक्ष्मन का ईमान भी
  कभी बिकता नहीं है
पर वो दिखता नहीं है

आज भी सीता की होती है
आए दिन अग्नि परीक्षा
आज भी कैकई देती है
भरत को झूठी शिक्षा
 हाँ वो झुकता नहीं है
पर वो दिखता नहीं है


 कपट छल फैला हुआ है
 घर घर में देख लो
सब का मन मैला हुआ है
लंका भेदी आज भी हैं
 पर कपटी रावण
कभी मरता नहीं है
पर वो दिखता नहीं है l
डॉ सरस्वती माथुर

आओ  दिवाली मनाएँ
मन का मैल धो डालें
नयाऐशता बांध कर
एक नया युग ले आयें
आओ दिवाली मनाएँ
झूठ सच चलता रहेगा
पाप पुण्य का तराजू
ऊपर नीचे हिलता रहेगा
पर हम अगर अकेले ही
चल कर संग कारवाँ
एक नया बांध कर
कर्म साध कदीलों