गुरुवार, 16 अक्तूबर 2014

दशहरे के दोहे ....".रावण का था मान !"

दशहरे के दोहे .....
1
स्वर्ण जडित लंका बसी रावण का था मान
पवन पुत्र ने फूँक दी जला दिया अभिमान l
सुनो चतुर्दिक गूँजता, राम-नाम मधुगान
जाओ रावण छोड़ के, तुम झूठा अभिमान
3
रावण का पुतला जला ,विजयादशमी-पर्व
परम सत्य विजयी हुआ, हुआ राम पर गर्व l
4
राम नाम की नाव में, होगा बेडा पार
खो जाओ प्रभु धाम में,यह जीवन का सार l
5
राम हृदय ने जान ली, वानर दल की भक्ति
मातु सिया की खोज मेँ ,सभी लगा दी शक्ति l
6
विजयी होके राम ने, किया दशानन अंत
देने को आशीश थे ,सँग मेँ सारे संत ।
7
मने सदा सद्भाव से , मनभावन त्यौहार
पूज राम को फिर करो , उनकी जयजयकार l
8
मिटे पाप संताप अब , आया पावन पर्व
रावण बध से मिट गया ,उसका सारा गर्व ।
9
धनुष चढाया राम ने ,जगी नई ये आश
हुआ विजय उद्घोष तब, और पाप का नाश l
10
विजयदशमी में बसा, है सच का रसपान,
उसी भाव से जल उठें, दीपों का दिनमान ।
11
भिन्न भिन्न हों मन सभी, किन्तु भावना एक,
शीश पापियों के सदा, कट कर गिरें अनेक ।
डॉ सरस्वती माथुर



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें