रविवार, 18 फ़रवरी 2018

नयी लघुकथाएं 
1
(बात की जड़ )
सच्चाई का दिया
"प्रोफ़ाइल तो बड़ा अच्छा है पर आपने अपना जन्मस्थान नहीं लिखा?" नौकरी के इंटरव्यू  के दौरान बोर्ड ने  रामदीन से पूछा 
"सर मुझे एक कचरा बीनने वाली देवी स्वरूपा मैया ने पाल पोस कर बड़ा किया है ,इस क़ाबिल बनाया है कि आप विद्वानों के सामने बैठा हूँ।"
"ओह -- पर शहर तो होगा ना ,जहाँ आप कचरे में मिले? "
"मैं रेल के डिब्बे की एक सीट के नीचे एक अख़बार में लिपटा साफ़ सफ़ाई की प्रक्रिया के दौरान मैया को  मिला -जहाँ वो काग़ज़ बीनने गयीं थीं , स्टेशन के फुटपाथ पर एक तंबू डाल कर मैया बंजारन की तरह रहती थी व हर दो महीने बाद वह शहर बदल लेती थीं। स्टेशन पर काफ़ी रद्दी व प्लास्टिक मिल जाता था।उसे कबाड़ी को बेच कर वो हम दोनों का पेट पालती थी ।  कैसे बताऊँ किस शहर का निवासी हूँ , बस यह जानता हूँ कि इंसान हूँ । "
इंटरव्यू बोर्ड के अधिकारियों ने सीधे उस आत्मविश्वासी  नवयुवक की आँखों में जलता सच्चाई का दिया देखा और बिना कोई और प्रश्न पूछे उसे नौकरी के लिये चुन लिया।
डाॅ.सरस्वती माथुर
2
(भाग्य की गति )
तरफ़दारी 
"तुम इतना सहती कैसे हो , तु्म्हारा मर्द बिना बात मारता है , क्यों पिटती 
हो ? " आज फिर भँवरी की गर्दन कलाइयों व चेहरे पर नील पड़ी देख कर राजो का सब्र का बाँध टूट गया था। 
"अरे बीबी जी मेरा मर्द जब होश में नहीं होता है तो पीटता है ,होश में होता है तो कहाँ पीटता है ? तब तो ख़ूब मीठा बोलता है ,  प्रेम करता है --जीवन है , सब चलता है बीबी जी  । हमारी जाति में तो औरत की यही नियति है ।"कह कर भँवरी रसोई में बर्तन माँजने चली गयी ।राजो को बड़ा विचित्र लगा यह देख कर कि विहस्की के एक पैग की तरह भँवरी अपने आदमी की पीटने की आदत का एक हिस्सा बन गयी थी। तभी तो  मार खा कर भी  अपने आदमी की तरफ़दारी कर रही थी।  
डाॅ. सरस्वती माथुर
(2.4.17)
3
(अज्ञात अंधेरे )
आशंका 
" आज क्या तुम  आटो से  दफ़्तर आई हो राधिका?" 
"अरे नहीं रागिनी तेरे पति ने ही तो छोड़ा मुझे ,कह रहे थे अभी तुम काम में लगी हो ज़रा देर लगेगी तुम्हें तो , मैंने उन्हें कहा भी कि आपका रास्ता एकदम दूसरे छोर पर है -दिक़्क़त होगी पर वो माने नहीं ।" उसकी बात सुन रागिनी  फीकी सी हँसी हंस दी । फिर दोनों बतियाती अपनी अपनी डेस्क पर बैठ गयीं। रागिनी ने आँखें मूँद कर ठंडी साँस ली और ना चाह कर भी सुबह के उन क्षणों में चली गयी जब उसने अपने पति से आग्रह किया था--"हरी,  क्या मुझे दफ़्तर छोड़ दोगे ?"
"नहीं रागिनी आज मेरी ज़रूरी मीटिंग है ।मैं बाॅस से पहले पहुँचना चाहता हूँ ।तुम प्लीज़ बस से निकल जाओ । " हरी ने स्पष्ट मना कर दिया ।
"चलो ठीक है।" कह कर रागिनी ने घर के शेष काम निपटाये।बस स्टाॅप पर पहुँची तो पड़ोसन में रहने वाली राधिका जो साथ ही काम करती थी उसे दिखी नहीं --वो हैरान थी कि बस तो नियत समय पर ही आती है कहाँ गयी जबकि जब वो लाॅन में लगे चिड़ियाओं के परिंडे में पानी डालने आई थी तो उसने राधिका को बस स्टाॅप की तरफ़ जाते देखा था। आफिस पहुँची तो रिसेप्शन पर खड़ी राधिका फ़ोन पर बतिया रही थी। 
"मैडम  चाय ।"  चपडासी की आवाज़ से वह वर्तमान में लौट आई । निगाहें उठाई तो रागिनी ने देखा कि राधिका बड़ी तन्मयता से डेस्क पर बैठी फ़ाइलें निपटा रही थी  । वह  चाय पीते हुअे नि:शब्द बैठी उसे काम करते देखती रही पर जाने क्यों आज उसका मन काम में नहीं लग पा रहा था। 
डाॅ.सरस्वती माथुर
(3.4.17) 
4
(आदमी की यात्रा  )
तबादला
"बोलो बहादुर कैसे आना हुआ?" हाथ जोड़े खड़े विभाग के चपडासी बहादुर से जलदाय  विभाग के राजनारायण जी ने पूछा 
"मालिक ,मेरा तबादला रोक दीजिये ,कहाँ जाऊँगा , बच्चे पढ़ रहे हैं ,पत्नी बिमार पड़ी है।" गिड़गिड़ाते हुअे बहादुर ने कहा 
"कोशिश करता हूँ पर एक शर्त मेरी भी है।" राजनारायण जी बोले
"हुक्म फ़रमायें।"
"सुबह -शाम मेरे घर का भी काम निपटाना पड़ेगा-झाड़ू-पोचा , खाना -,मंज़ूर हो तो काम हो जायेगा।" राजनारायण जी ने मुस्कुराते हुअे फ़रमान छोड़ा ।
मरता क्या ना करता हामी भर कर तबादला तो करवा लिया बहादुर ने लेकिन तब से अब तक कोल्हू के बैल की तरह घूम रहा हैं। 
डाॅ.सरस्वती माथुर 
5
(3.4.17)
(मन का सुख )
वसीयत 
विशाल की बुआ रामदेवी कच्ची उम्र में ही विधवा हो गयीं थी । ससुराल अमीर था पर वह वहाँ टिक नहीं पायीं -एक बड़ी जायदाद लेकर वह अपने बड़े भाई के पास रहने आ गयीं थीं ।एक पुत्र की माँ भी थी वे जिसे मामा ने पढ़ाया और अमेरिका भेजा ,पढ़ाई के बाद धूमधाम से शादी भी की । एक बड़ी कंपनी में वह नौकरी पर भी लग गया था पर बुआ की उसकी पत्नी से निभी नहीं । इसी दौरान भाई भी गुज़र गये ।
एक दिन विशाल की पत्नी सुुजाता ने शिकायती लहजे में कहा-- "यह अपने बेटे के पास क्यों नहीं जा रहीं वापस?"
"बहू से पटरी नहीं बैठ रही उनकी सुुजाता ,मैं बुआ से बहुत प्यार करता हूँ ,हमें उन्हें निभाना ही पड़ेगा ।"विशाल ने अपना फ़ैसला सुना दिया । 
"और कोई बात नहीं विशाल हमारे पास केवल दो कमरे हैं जबकि उनकी ख़ुद की इतनी बड़ी कोठरी है -परिसर में दो घर बने हैं ..."बात अधूरी छोड़ कर सुुजाता चुप हो गयी। 
एक दिन तेज़ बुखार आया और बुआ शांत हो गयीं । दाह संस्कार के समय बेटा बहू भी पहुँचे । तभी बुआ के  रिश्ते के एक वक़ील देवर ने उनकी वसियत खोल दी ।जानकी परिसर में बनी अपनी कोठरी का एक हिस्सा वह विशाल के नाम लिख कर यह आग्रह कर गयीं थी कि मेरे क्रियाक्रम के तुरंत बाद विशाल वहाँ शिफ़्ट कर ले ,मेरे मन को इसी में सुख मिलेगा वरणा  मेरी आत्मा को बहुत ही कष्ट होगा। विशाल ने वसीयत  सुनकर जैसे ही बुआ के बेटे बहू की ओर दृष्टि घुमाई - देखा , दोनों की निगाहें झुकी हुई थी और सुुजाता की आँखों से टपटप आँसू बह रहे थे। 
डाॅ.सरस्वती माथुर 
6
(टूटा हुआ तारा )
जीवन संगिनी 
"अजी देवर जी ,अब तो जैट  लैग निकल गया होगा भाई , ज़रा हमसे भी बातें कर लो ना - अमेरिका के किस्से विस्से सुनाओ ? "भाभी ने रघुवीर के कमरे में आकर कहा तो रघुवीर मुस्कुरा दिया ।
"जी भाभी बिलकुल ,मैं ज़रा अपने जिगरी दोस्त नीलेश को फ़ोन कर रहा था पर उसका स्वीच आॅफ आ रहा है। "
"अरे पर वो तो हनीमून पर गया हुआ होगा । कह रहा था कि तुम्हें यथासमय शादी का कार्ड भेज दिया है, दरअसल अचानक ही उसकी शादी तय हुई--  चट मँगनी पट ब्याह वाला मामला हो गया । वो कह रहा था कि तुम्हें फ़ोन पर सूचित कर दिया है।हमें भी बुलाया था , हम गये भी थे। हाँ यह ज़रूर कह रहा था कि तुम फ़ोन नहीं उठाते हो।"
"हाँ तो व्हाटस अप पर मैसेज तो देता --उसने लास्ट टाइम बात की थी तब भी नहीं बताया । "
"पता नहीं देवर जी यह मालूम पड़ा है कि उसने अपनी कालेज फ़्रेंड रंजीता से शादी की है ।" भाभी ने कहा तो रघुवीर पर तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा ।यह कैसे हो सकता है , रंजीता तो उसकी जीवन संगिनी बनने वाली थी ।पिछले महीने ही तो फ़ोन पर बात हुई थी । तब उससे  कह रही थी कि  रघुवीर जल्दी आ जाओ अब इंतज़ार नहीं होता। 
रघुवीर बुत बना सोच रहा था कि उसने तो सोचा था कि उसका मैसेज मिलते ही उसका यार  नीलेश दौड़ा चला आयेगा । होली दिवाली पर वह उसे अमेरिका से काॅल करता था तो औपचारिक बातें ही हो पाती थी।सोचा था कि अब मिलेंगे तो कालेज के हसीन लम्हों में खो जायेगें । इसी बीच वह एक कंपनी का सी.ई.ओ भी हो गया है ,जम कर पार्टी शॉर्टी करेंगें पर यह शादी की ख़बर तो रघुवीर लिये विस्फोट से कम नहीं है ।इतना बड़ा धोका । गहरी साँस खींच कर रघुवीर ने खिड़की की तरफ़ देखा ।
स्याह  नभ से लकीर खींचता हुआ एक तारा सरसराता हुआ उसकी आँखों के सामने से निकल गया ।ना जाने कहाँ जा कर गिरा होगा - टूटा हुआ तारा। 
डाॅ.सरस्वती  माथुर 
(4.4.17)
(मयूर पंख )
7
चिड़िया वाला 
श्यामा बरामदे में बैठी स्वेटर बुन रही थी ,तभी काॅलोनी के बच्चों की टोली धींगामस्ती करती हुयी उनके घर की तरफ़ आयी और श्यामा से आग्रह करने लगी -"आंटी जी - आंटी जी परिंदें ख़रीद लीजिये ना । "
"कौनसे परिंदें ।"स्वेटर बुनना छोड़ वो वो उनसे बातें करने लगी 
तभी चिड़ियां बेचने वाला उसके सामने आ कर कहने  लगा---"पचास की दो दे दूँगा मेमसाहिब,इन्हें आज ही पकड़ा है।"
चिड़िया बेचने वाले ने जैसे ही कठोर उँगलियों से पिंजरों पर हाथ फेरा ।पंछी सहमें से स्वर में ज़ोर ज़ोर से चीं चीं करते गोल गोल पिंजरें पर फड़फड़ाते हुअे घूमने लगे। 
"इन्हें जाल फेंक कर पकड़ते हो?"
"जी मेमसाहिब पहले वन विभाग में काम करता था पर नौकरी से निकाल दिया तब से कर रहा हूँ  पंछी बेचने का काम । वनों के बाहर दाना डालता हूँ तो तोते और रंगीन पंछी आ जाते हैं ।" 
पिंजरों के आसपास आलथी - पालथी मार कर बैठे बच्चे पंछियों को पुचकारते हुअे उनसे संवाद कर रहे थे ।श्यामा का मन भर आता है । भावुक हो वह एक दर्जन पंछी ख़रीद लेती है,  उन्हें पुचकारने के बाद बच्चों को कहती है -"इन्हें पिंजरों खोल कर उड़ा दो ।"
बच्चे एक स्वर में चिल्लाते हुअे उन्हें एक के बाद एक आकाश में छोड़ देते हैं । 
चिड़िया वाला मुस्कुरा कर विदा लेता है ।बच्चे शौर मचाते हुअे वापस खेलने भाग जाते हैं ।श्यामा भावुक सी आसमान की तरफ़ देखती है जहाँ गोल गोल चक्कर लगाते हुअे पंछी उन्मुक्त उड़ रहे हैं ।
डाॅ. सरस्वती माथुर 
9.4.17
8
 चित्र पर आधारित 
 मायाजाल 
एक साल जाने कैसे निकल गया । सखी - साथियों ने चिरौरी की किभाई आज पार्टी देनी पड़ेगी मैडम ,आज आपको जोइन करें एक साल हो गया है तो उनके लिये प्रभा ने चाय समोसा मँगाया ।आज कुछ फ़ुरसत भी थी क्योंकि टीचर - पैरेंट मिटिंग दो घंटे में ख़त्म करके सभी अध्यापिकाएं स्टाॅफ -रूम में तनावरहित बैठी बतिया रहीं थीं ! प्रभा आज ज़रूर थोड़ी उदास थी ।उसने आज जो देखा अनुभव किया उसकी उसने कभी सपने में भी कल्पना नहीं की थी। उसे याद है गाँव में तो छात्र - छात्राएँ जब कोई प्रश्न पूछने आते थे तो वह तुरंत समाधान कर  देती थीं पर शहर में तो बाक़ायदा सौदेबाज़ी है।शिक्षा का बाज़ारीकरण हो गया है । जब उसका तबादला गाँव से शहर में हुआ था तो नया शहर नये लोग देख कर प्रभा के मन में बस यही ख़्याल आया था कि देहरी लांघी है तो चुनौतियों का सामना तो करना होगा । एक सरकारी स्कूल में जब गाँव में पढ़ाती थी तो वातावरण बहुत अपना सा था परन्तु पलटते युग की मान्यताओं के अनुसार गाँव के सरकारी स्कूलों का जुड़ाव शहरों के स्कूल से होते हुअे तबादलाों की चुनौतियाँ सामने आ खड़ी हुई । उन्हें शहर आना ही पड़ा।  पहला दिन परिचय करने में बीता ।धीरे-  धीरे प्रभा शहर की अभ्यस्त होने लगी । अब एक साल बाद वह बहुत कुछ सीख गयी थी। आज टीचर पैरेंट मिटिंग में  मिसेज़ धर ने तो हद ही कर दी !उसने अभिभावकों को साफ़ कहते सुना - "देखिये मैडम-सर आपको बच्चों को टयूश्न करवाने घर भेजना होगा वरणा वो अच्छें नंबरों से पास नहीं हो पायेंगें ।" विडम्बना यह थी कि अभिभावक भी सहर्ष राज़ी हो रहे थे ! प्रभा को एक पल के लिये तो यह अहसास हुआ कि यह स्कूल एक मायाजाल है । भ्रष्टाचार का एेसा तालाब है जिसमें छोटी छोटी मछलियाँ तैर रही हैं और वहाँ की अध्यापिकाएं बड़ी मछलियाँ हैं जो उन छोटी मछलियों को जीते जी निगल जाती हैं!
डाॅ.सरस्वती माथुर 
9
परिवर्तन 
"तुम ख़ुश तो हो ना राजरानी ?" पिता ने शादी के दो  साल बाद लौटी अपनी बेटी से पूछा तो वह मुस्करा दी 
"आपने राजकुमार ढूँढा है पापा ,ख़ुश तो होऊंगी ।"
"हाँ ,पर तुम्हारा गीत-संगीत कैसा चल रहा है ?" बेटी चुप रही 
" कुछ पूछ रहा हूँ बच्ची ?" पिता चिन्तित दिखे 
" तार टूट गये हैं पापा , कला और पैसा दोनों सागर के दो  किनारे हैं ,आप जानते हैं ना?"
"हां बेटी ,समझ गया ।" पिता खिड़की पर आ खड़े हुअे । आकाश में उन्मुक्त मँडराते पंछी जाने क्यों उन्हें आज अच्छे नहीं लग रहे थे। 
डॉ सरस्वती माथुर 
10
राजनीति





लघुकथाएं -- part ----3
1
 तमाशबीन
"यह कैसे गिरा?"
"शायद कार से टकरा कर ?"
"ओह बिचारा जल्दी में होगा!"
" है कौन ?"
"पता नहीं चल पा रहा,पर निसंदेह आम आदमी है , देखो ना -टिफ़िन भी खुल कर बिखर गया है ,पराँठे के साथ अचार लाया है।"
"हाँ ,महँगाई कितनी बढ़ गयी है"
"पूछो मत दाल रोटी खाना भी मुश्किल हो रहा है !"
"सड़क पर ट्रैफ़िक इतना बढ़ गया है कि रोज़ ही एक्सीडेंट हो रहे हैं ।"
"पुलिस को ख़बर करनी चाहिये!"
"क्या मालूम ज़िंदा हो तुरंत एम्बूलेंस बुला कर अस्पताल ले जाना चाहिये ।"
यह संवाद बीच सड़क पर ख़ून से लथपथ पड़े एक घायल आदमी के इर्द गिर्द खड़े तमाशबीनों के बीच चल रहा है  । सुबह दस बजे का समय -- लोग इधर से उधर भागते हुअे हवा पर सवार थे  पर किसी के पास रूकने का समय नहीं था  ! तभी मीडिया भी आ पहुँचा और संवादों का रूख बदल गया --भीड़ भी बढ़ गयी , अब तमाशबीनों में कैमरे पर चेहरा दिखाने की होड़ लग गयी थी  । हर शख़्स इस एक्सीडेंट का आँखों देखा हाल बताने को उत्सुक्त था ।सुबह से सारे टी.वी. चैनलों पर एक्सीडेंट की चर्चा का मुख्य विषय था-'बढ़ती भीड़ और घटती मानवीय संवेदनाएँ ।' इस विचार विमर्श के दौरान कोई नहीं जान पाया कि वह इंसान बचा या मर गया !
डाॅ . सरस्वती माथुर
21.june17
2
ख़ज़ाना
" मांँ , यह ख़ज़ाना किसकी अमानत है? "
"किसकी होगी  रानो ,तू मेरी इकलौती बेटी है ,यह ख़ज़ाना भी तेरे पास ही रहेगा ! "
" इसकी चाबी कहाँ है?"
"अलमारी में ही मिलेगी बिटिया।"मैं नहीं रहूँ तब इसे मेरे तीये से पहले ही खोल कर देखना ।"
दरअसल रानो की माँ के पास एक पीतल का सुंदर सा नक़्क़ाशीदार कटोरदान था जिसमें कुंडी लगी थी और ताला लगाने का प्रावधान भी था। जब भी उसकी माँ अलमारी खोलती  वह कपड़ों के बीच चमकता नज़र आता ।कई बार रानों ने माँ से पूछा भी-" इसमें क्या है माँ , बताओ तो। "
"ख़ज़ाना है इसमें !"वह मुस्कुरा कर कहती ,फिर अपने काम में लग जाती। रानों के पिताजी को गुज़रे एक अरसा  बीत   चुका था ।रानों को तो पिता की शक्ल भी याद नहीं थी। हाँ ,उसकी माँ हमेशा कहती थी कि वह हूबहू अपने पिता से मिलती है। और एक दिन माँ भी शांत हो गयी ।दाह संस्कार के बाद पंंडिताइन के लिये साड़ी निकालने के लिये,रानों ने अलमारी खोली तो कटोरदान पर नज़र पड़ी और माँ की बात स्मरण हो आई । कटोरदान उठाया तो चाबी उसी के नीचे रखी थी ।उत्सुकता से रानों ने कटोरदान खोला तो हैरत में पड़ गयी, उसमें राख रखी थी ,उसके ऊपर माँ -पिता जी की तस्वीर रखी थी और एक ख़त रानों के नाम का रखा था।उसमें लिखा था- "बेटा,यह कटोरदान हमेशा तुम्हारे लिये रहस्य बना रहा ।जब तेरे पिताजी के दाह -संस्कार के बाद उनकी अस्थियाँ घर आई तो मैंने उस पोटली में से कुछ राख रख ली और अब मेरी इच्छा है कि तेरे पिता की राख के साथ मेरी राख मिला कर ही विसर्जन करना ताकि हम दोनो एक साथ गंगा में प्रवाहित होकर अगले जन्म में फिर मिल सकें। रानों की यह सोच कर आँखें भर आयी कि माँ की यह कैसी अजीबोग़रीब इच्छा थी? रानों ने पिता की राख को हाथ से छुआ तो जाने क्यों उसे लगा कि राख अब तक गरम है ।वह देर तक राख को मुट्ठी में दबाये देखती रही ।
डाॅ.सरस्वती माथुर
3
माँ का सपना
"तुझे बहुत बड़ी गायिका बनना है ख़ुशी , चल उठ जा री तेरी संगीत टीचर आने वाली है , ज़रा रियाज़ कर ले बेटा।" ख़ुशी नींद में ज़रा कुनमुनाई फिर उठ बैठी ।
"माँ आपकी मम्मी का आपको लेकर क्या सपना था?"
मेरी माँ मुझे एक डाक्टर बनाना चाहती थी पर मैं गायिका बनना चाहती थी  !"
"और उनकी मम्मी का उनको लेकर क्या सपना था?"
" मेरी नानी चाहती थी कि वो कलक्टर बने !"
"ओह तो नानी की महत्वाकांक्षाये बहुत ऊँची थी ।"
"हाँ ,वो अंग्रेज़ों के ज़माने की थी ना । उन्हें राजसी ठाठ बाट वाली जीवन शैली आकर्षित करती थी। मेरे नाना अंग्रेज़ों के राज में मुंशी का काम करते थे ,कई पार्टियों में नानी भी जाती थी उनकी कार्यशैली पर फ़िदा थीं । उन्होनें किसी से सुन लिया था कि लड़कियों को शिक्षा मिले तो वह कलक्टर बन सकती हैं बस उनकी आँखों में अपनी बेटी को लेकर एक सपना तैरने लगा पर वह नहीं बन पायी पर हाँ वो डाक्टर बनना चाहती थी ,वह नाना के साथ एक बार अस्पताल गयी थी , वहाँ डाक्टरों को देख कर वह बहुत प्रभावित हुईं थीं पर बन नहीं सकीं। जल्दी ही शादी के बंधन में बंध गयीं ।वह बहुत अच्छा गाती थीं उन्हें घर में काम करते करते मैं मधुर स्वर में गाना गाते देखती थी ,उनका गाना सुनना मुझे बहुत अच्छा लगता था पर लड़कियों को पिताजी का गाना सीखने जाना पसंद नहीं था तो मेरी इच्छा अधूरी रह गयी । पर बेटा तुम्हारी आवाज़ अच्छी है ,मुझे लगता है तुम्हें गायन का क्षेत्र चुनना चाहिये !"
सत्रह साल की ख़ुशी ने मम्मी की आँखों में देखा और मुस्कुरा कर बोली-"ठीक है ममा गायिका ही बनूँगी ,तुम्हारा सपना ज़रूर पूरा करूँगी ।" ख़ुशी ने देखा माँ की आँखों में तेज़ चमक आ गयी है ।
"लो मेरा एक कंपोज़ किया हुआ गाना  हैडफ़ोन कान में लगा कर सुनो और बताओ कैसा बना है ?"  कह कर ख़ुशी लैपटाॅप में साऊंड क्लाऊड एेप पर हारमोनियम  की धुन लगा रियाज़ करने बैठ गयी पर सुर नहीं सध पा रहे थे - शायद एक अच्छी नृत्यांगना बनने का सपना बार -बार उस सुर पर हावी हो रहा था।
डाॅ.सरस्वती माथुर

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

 

 
"विश्व परिवार दिवस: मौका परिवार के सामाजिक सांस्कृतिक मूल्यों को बचाने का !"
विश्व भर में 15 मई को अंतराष्ट्रीय परिवार दिवस दिवस मनाया जाता है! रिपोर्ट के अनुसार इस दिन को मनाने का फैसला संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सन् 1993 किया था।संयुक्त राष्ट्र ने 1994 को अऩ्तर्राष्ट्रीय परिवार वर्ष घोषित किया था। समूचे संसार में लोगों के बीच परिवार की अहमियत बताने के लिए 1995 से यह सिलसिला जारी है। परिवार की महत्ता समझाने के लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इस दिन के लिए जिस प्रतीक चिन्ह को चुना गया हैउसमें हरे रंग केएक गोल घेरे के बीचों बीच एक दिल और घर अंकित किया गया है। इससे स्पष्ट है कि किसी भी समाज का केंद्र (दिल) परिवार ही होता है। परिवार ही हर उम्र के लोगों को सुकून पहुँचाता है।
इस वर्ष इस त्योहार का आदर्श-वाक्य है- "परिवार और पूरे समाज के लाभ के लिए काम और पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के बीच संतुलन।"
परिवार बच्चों को सांस्कृतिक मान्यताओं को सिखाने का माध्यम है। परिवार वह आधारभूत संस्था है जो समाज में नियंत्रण लाने का मूल स्रोत है। परिवार यानी माता-पिता। बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में संतोषजनक पारिवारिक जीवन अत्यंत आवश्यक है।

आज संयुक्त परिवार तो टूट ही रहे हैं, एकल परिवार में भी बच्चों की तरफ पूरा ध्यान नहीं दिया जा रहा। पति-पत्नी दोनों काम पर जाते हैं। नौकरों आया की कृपा पर बच्चा पल रहा है या ‘क्रेच’ में छोड़ दिया जाता है। चाहकर भी माता-पिता बच्चों पर ध्यान नहीं रख पाते। बच्चे अक्सर इन हालात में उपेक्षित हो रहे हैं और अनेक प्रकार की संवेगात्मक गंभीर समस्याओं का शिकार हो रहे हैं जो अत्यंत चिंता का विषय है।
हमारे प्राचीन ग्रंथ में कहा गया है,“वृद्धवाक्यैर्विना नूनं नैवोत्तरं कथंचन!” अर्थात्‌ वृद्ध लोगों के वाक्यों के बिना किसी प्रकार का भी निस्तार नहीं है। इसी तरह एक फ़ारसी लोकोक्ति है,“ज़्यारते बुज़ुर्गां कफ़ारह-ए-गुनाह।”अर्थात्‌ वयोवृद्ध का सम्मान करने से पापों का नाश होता है। संयुक्त परिवार में वृद्ध परिवार के मुखिया होते थे और उनकी बातों को महत्व दिया जाता था। “टूटते परिवार और बिखरता समाज”के इस दौर में आज इन संस्कारों का अर्थ नहीं रह गया। आज के संदर्भ में तो यह सटीक बैठता है,
उत्साहशक्तिहीनत्वाद्‌ वृद्धो दीर्घामयस्‌ तथा।
स्वैरेव परिभूयेते द्वावप्येतावसंशयम्‌॥
अर्थात्‌ इसमें कोई संदेह नहीं कि वृद्ध व्यक्ति में उत्साह एवं शक्ति कमी होती है क्योंकि वे स्वजनों द्वारा ही तिरस्कृत होते हैं। आज की युवा पीढी बूढों को बर्दाश्त नहीं कर पा रही है। शायद भौतिकतावादी इस युग में उन्हें धन ही सबसे बड़ी चीज़ दिखती है। जीवन मूल्यों में तेजी से परिवर्तन होने लगा है और परिवार कभी जिसमें दो से लेकर चार और पांच पीढ़ियों के लोग भी रहते थे धीरे धीरे बिखर कर अब सिर्फ एकल परिवार के रूप में दिखलाई देने लगे हैं। जो आज के परिप्रेक्ष्य में परिवार की भूमिका को निभा नहीं पा रहे हैं। समाज में घटित होने वाली अधिकांश घटनाएँ समुचित पारिवारिक वातावरण के अभाव में ही हो रही हैं। इनमें से चाहे आत्महत्या का मामला हो,बच्चों के बहकते कदम हों या फिर आभासी दुनियाँ में खोते जा रहे बच्चोंसे लेकर युवा तक के लोग हों।
आज विश्व बड़ी तेजी से बदल रहा है। पारिवारिक संसाधन को अक्षुण्ण रखने हेतु इस बदलते विश्व में परिवार की ज़िम्मेदारियां भी काफी बढ़ गई हैं। परिवार से जुड़े मुद्दों के प्रति हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए।
अथर्ववेद में परिवार की कल्पना करते हुए कहा गया है,
अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु संमनाः।
जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शन्तिवाम्‌॥
अर्थात्‌ पिता के प्रति पुत्र निष्ठावान हो। माता के साथ पुत्र एकमन वाला हो। पत्नी पति से मधुर तथा कोमल शब्द बोले।
परिवार कुछ लोगों के साथ रहने से नहीं बन जाता। इसमें रिश्तों की एक मज़बूत डोर होती है, सहयोग के अटूट बंधन होते हैं, एक-दूसरे की सुरक्षा के वादे और इरादे होते हैं। हमारा यह फ़र्ज़ है कि इस रिश्ते की गरिमा को बनाए रखें। हमारी संस्कृति में,परंपरा में पारिवारिक एकता पर हमेशा से बल दिया जाता रहा है। 
परिवार एक संसाधन की तरह होता है। परिवार की कुछ अहम जिम्मेदारियां भी होती हैं। इस संसाधन के कई तत्व होते हैं।
दूलनदास ने कहा है
दूलन यह परिवार सब, नदी नाव संजोग।
उतरि परे जहं-तहं चले, सबै बटाऊ लोग॥ 
पालिटिक्स में कही अरस्तू की बात मानें तो,
“परिवार तो मनुष्य की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रकृति द्वारा स्थापित एक संस्था है”,परिवार कुछ लोगों के साथ रहने से नहीं बन जाता। इसमें रिश्तों की एक मज़बूत डोर होती है,सहयोग के अटूट बंधन होते हैं,एक-दूसरे की सुरक्षा के वादे और इरादे होते हैं। हमारा यह फ़र्ज़ है कि इस रिश्ते की गरिमा को बनाए रखें। हमारी संस्कृति में,परंपरा में पारिवारिक एकता पर हमेशा से बल दिया जाता रहा है। संयुक्त परिवार में जहां सामुदायिक भावना होती है वहीं छोटे परिवार में व्यक्तिगत भावना प्रधान होती है। जहां व्यक्तिगत भावना हावी होगी वहां स्वार्थ का आ जाना स्वाभाविक है। सब अपना-अपना सोचने लगते हैं। आज विश्व भर में एकल परिवार की जैसे लहर सी फैल रखी है. बच्चे बड़े होकर नौकरी क्या करने लगते हैं, उन्हें खुद के लिए थोड़ा स्पेस चाहिए होता है और वह स्पेस उन्हें लगता है अलग रहकर ही मिल पाता है. मैट्रोज में तो अब खुद मां बाप ही बच्चों को नौकरी और शादीशुदा होने के बाद अलग परिवार रखने की सलाह देते हैं. लेकिन अकेला रहने की एवज में समाज को काफी कुछ खोना पड़ रहा है.परिवार से अलग रहने पर बच्चों को ना तो बड़ों का साथ मिल पा रहा है जिसकी वजह से नैतिक संस्कार दिन ब दिन गिरते ही जा रहे हैं और दूसरा,इससे समाज में बिखराव भी होने लगने लगता है!
परिवार समाज की महत्त्वपूर्ण इकाई है1
जैनेन्द्र ने इतस्ततः में कहा है,
“परिवार मर्यादाओं से बनता है। परस्पर कर्त्तव्य होते हैं, अनुशासन होता है और उस नियत परम्परा में कुछ जनों की इकाई हित के आसपास जुटकर व्यूह में चलती है। उस इकाई के प्रति हर सदस्य अपना आत्मदान करता है, इज़्ज़त खानदान की होती है। हर एक उससे लाभ लेता है और अपना त्याग देता है”।
आज तो जीवन बिल्कुल यांत्रिक हो गया है। रिश्ते भी औपचारिकता तक सीमित हो गये हैं जिसमें आपसी स्नेह, माधुर्य, सौहार्द्र और परस्पर विश्वास की कमी आ गई है। आज यह बहुत ज़रूरी है कि हमारो सम्बन्धों में मज़बूती हो, एकजुटता हो, दृढ़ता हो। विश्वास की दृढ़ता प्रारंभ से हमारे देश में संयुक्त परिवार का प्रचलन ही रहा है !संयुक्त परिवार ऐसे कई छोटे परिवारों का समूह है जिसमे घर के प्रत्येक सदस्य की जिम्मेदारी , सुविधाएँ और सुख दुःख भी साझा ही होते हैं . संयुक्त परिवार का एक मुखिया होता है , जो परिवार के सभी सदस्यों के लिए नीतियाँ और निर्देश देता है,इन परिवारों में पुत्र विवाह के बाद अपने लिए अलग रहने की व्यवस्था नहीं करता . परिवार में जन्मे बच्चों के पालन पोषण के लिए एक स्वस्थ वातावरण निर्मित होता है जिसमे वह समाज में घुल मिल जाने के संस्कार , नीतियाँ , दायित्व आदि सीखता है , एकल परिवार में जहाँ कुछ ही लोगों का लाड़ दुलार मिलता है , वही संयुक्त परिवारों में बच्चा विभिन्न प्रवृतियों वाले एक बड़े समूह के बीच रहता है ,जहाँ उसे लाड़ दुलार के साथ समाज में विभिन्न परिस्थितियों में सामंजस्य स्थापित करने के गुण सीखता है जो उसके भावी जीवन के लिए एक सुदृढ़ नींव का निर्माण करते हैं ,इन परिवारों में किसी भी बुजुर्ग,अविवाहित या बेरोजगार को विशेष समस्या का सामना नहीं करना पड़ता क्योंकि बाकी सदस्य उनकी जिम्मेदारी उठा लेते हैं .मनुष्य को अवसाद , उदासी , अकेलेपन से बचाने में इन परिवारों की सशक्त भूमिका होती है! 
भारतीय सभ्यता वसुधैव कुटुम्बकम अर्थात सारा विश्व हमारा परिवार जैसे संस्कार के लिये प्रसिद्ध है!परिवार एक सोच है , रिश्तों का संस्कारों का - जहाँ इसका अस्तित्व है , वह एकल हो या संयुक्त - सही मायने में परिवार वही है ,ढोने जैसी भावना का निर्वाह नहीं होता!जिस परिवार में एकता और एकजुटता होती है उसमें समृद्धि होती है। वहां रिश्ते सुंदर होते हैं। क्योंकि वहां कोई भेद-भाव नहीं होता। सब एक दूसरे की मदद करते हैं। एक-दूसरे के प्रति स्नेह-प्रेम-सद्भाव रखते हैं। इस तरह का परिवार ऐसा लगता है मानों सारा संसार उसमें सिमट गया हो।कुछ खामियां भी हैं,जैसे गोपनीयता का अभाव और छोटी-छोटी बातों पर तनाव व आंतरिक कलह। इसके अलावा संयुक्त परिवार की अपेक्षा छोटा परिवार चलाना काफी सुगम होता है। आर्थिक विकास के कारण गांवों से शहरों की तरफ जो लोगों का पलायन बढ़ा तो छोटे परिवार रखना आवश्यक हो गया। ऐसे परिवार में व्यक्तिगत अधिकारों पर ज़्यादा जोर दिए जाने के फलस्वरूप घर के वातावरण में परिवर्तन आने लगा।संयुक्त परिवार एक लुभावनी धारणा है,लेकिन प्रत्येक व्यक्ति की दिन प्रति दिन हो रही आर्थिक और मानसिक उन्नति ने संयुक्त परिवार की अवधारणा को बहुत नुकसान पहुँचाया है . आज एक परिवार कई परिवारों के साथ एक संयुक्त ढांचे में रहकर स्वयं को बंधन में महसूस करते हैं ,पहले तो संयुक्त परिवार बचे ही नहीं है और जो हैं वे क्लेश के घर बने हुए हैं ,जिन परिवारों में संयुक्तता बची हुई है ,उनमे एकल परिवारों को उपहास की दृष्टि से देखा जाता है !
आधुनिकीकरण,औद्योगीकरण,व वैश्वीकरण के कारण हमारी सामाजिक मान्यताएं बदलती जा रहीं हैं। हमारे देश की पारिवारिक पद्धति भी इससे अछूती नहीं है।पश्चिम के कुसंस्कारों का प्रभाव हमारी युवा पीढी पर पढने से संयुक्त परिवार व्यवस्था को आघात पहुच रहा है ।आजकल महानगरों के एकल परिवारों में रहने वाले बच्चे खुद को बहुत अकेला महसूस करते हैं। पहले संयुक्त परिवारों में माता-पिता के अलावा कई अन्य सदस्य होते थे। जिनके साथ रहकर बच्चों में सहजता से शेयरिंग और केअरिंग की भावना विकसित होती थी, पर अब ऐसा नहीं है। न्यूक्लियर फेमिली में भी एक ही बच्चे का चलन बढता जा रहा है। इससे बच्चे आत्मकेंद्रित हो रहे हैं। पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित हो भारतीय समाज बहुत तेजी से अपनी मौलिक व्यवस्थाओं में परिवर्तन ला रहा है,संयुक्त परिवार जो कभी भारतीय सामाजिक व्यवस्था की नींव हुआ करते थे,आज पूरी तरह विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके हैं!इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि बदलते आर्थिक परिवेश में लोगों की प्राथमिकताएं मुख्य रूप से प्रभावित हो रही हैं, मनुष्य का एकमात्र ध्येय केवल व्यक्तिगत हितों की पूर्ति करना ही रह गया हैlअपने स्वार्थ सिद्धि के लिए वह अपने परिवार के साथ को भी छोड़ने से पीछे नहीं रहता ! इसके अलावा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बढ़ती मांग भी परिवारों के टूटने का कारण बनती हैlपिछले डेढ़-दो दशक में पारिवारिक पद्धति, खासकर संयुक्त परिवार के रूप में काफी बदलाव आता गया है। इसका असर पूरे विश्व में और ख़ासकर भारत में तो काफ़ी बुरा पड़ा है। बीते समय के साथ संयुक्त परिवार का स्वरूप टूट कर लघु से लघुतम परिवार में बदलता गया है।समाज में घटती नैतिकता के दुष्परिणाम हम सबके सामने हैं ही; बच्चों का अनैतिक कार्यों में शामिल होना, सेक्स के प्रति उनकी हिंसात्मक प्रतिक्रिया, प्रेम का गलत मतलब, स्कूल में पढ़ने की जगह मोबाइल जैसी चीजों में समय बर्बाद करना, मां बाप का कहना ना मानना ऐसी कई घटनाएं है जिनकी वजह से यह साबित हो गया है कि गिरता नैतिक स्तर समाज को डुबो रहा है,परिवार केपास इतना समय नहीं होता है कि वे देखें कि उनके बच्चे क्या कर रहे हैं?हाँ, सारी आधुनिक सुविधायों को जुटानेको ही वे अपने दायित्वों कि पूर्ति समझ बैठते हैं।
पलटते युग की मान्यताओं के बदलाव और जीवन शैली में हुए परिवर्तन के स्वरुप चाह कर भी माँ बाप बच्चों के लिए समय नहीं निकाल पातें, उनके बचपन को उनके साथ शेयर नहीं कर पाते! परिवार में खुद पति पत्नी पैसे कमाने की आपाधापी में दिन में १७-१८ घंटे काम में लगे रहते हैं और उनकेपास इतनी ऊर्जा शेष नहीं रहती है कि वे दिन भर के अपने सुख और दुःख को बाँट सकें। या फिर बच्चों के साथ बैठ कर उनसे कुछ शेयर कर सकें । बच्चों के मन में दिन भर के बाद ढेर सी बातें होती हैं कि वे मम्मी और पापाको बताएँगे लेकिन मिलता उनको कुछ भी नहीं है।
'हम बहुत थके हैं बेटा, फिर कभी करेंगे इस बारे में बात। '
'बहुत परेशान करोगे तो हम तुम्हें होस्टल में डाल देंगे।'बच्चों के ऊपर अंकुश की कमी हो जाने से युवा पीढ़ी अधिक उच्छृंखल हो गई। बुजुर्गों के प्रति सम्मान में कमी आने लगी है। वे अपने को उपेक्षित महसूस करते हैं। अकसर ही घर के बुजुर्गों को यह कहते सुना जा सकता है कि हमारे जमाने में इतना बड़ा परिवार था और हम सब दुःख-सुख बांट कर काफी हंसी-खुशी के दिन बिताया करते थे। वे बातें आज कहां! अब एक संयुक्त परिवार की बात लें , एक ही घर में कई अलग घर बसे हुए , जो सबल है , अर्थ में , जबान में वह जीत में , मकान में दरारें पडी हैं , घर में बुजुर्ग बीमार है , कोई साझा मेहमान आया है ...ये इस परिवार की समस्या है क्योंकि साझेदारी का काम है ,कोई एक पहल क्यों करे ,जिम्मेदारी क्यूँ उठाये ,महँगी कटलरी , अचार ,मिठाई आदि प्रत्येक कमरे में उनके ससुराल पक्ष के लिए सुरक्षित होती हैं ,कौन आया ,कौन गया , घर का बुजुर्ग सदस्य देखेगा क्योंकि यह घर तो उसका ही बसाया है ,जब तक बच्चे छोटे हैं ,उनकी देखभाल के लिए परिवार की जरुरत है , बुजुर्ग के पास धन है , तब तक उनकी जरुरत है , वरना घर के एक कोने में रहते हुए बाकी सदस्यों के चेहरे देखने , बात करने को तरस जाते हैं ,कई दिनों तक आपस में संवादहीनता बनी रहती है-
-"भास के दूतवाक्यम्‌ में कहा गया है,
कर्तव्यो भ्रातृषु स्नेहो विस्मर्तव्या गुणेतराः।
सम्बन्धो बन्धुभिः श्रेयांल्लोकयोरुभयोरपि॥"
दोषों को भूलकर भाइयों पर केवल स्नेह करना चाहिए, बन्धुओं से प्रेम स्थापित करना, लोक-परलोक दोनों के लिए लाभदायक होता है।प्राणी जगत में परिवार सबसे छोटी इकाई है या फिर इस समाज में भी परिवार सबसे छोटी इकाईहै। यह सामाजिक संगठन की मौलिक इकाई है। परिवार के अभाव में मानव समाज के सञ्चालन की कल्पना भीदुष्कर है। प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी परिवार का सदस्य रहा है या फिर है। उससे अलग होकर उसके अस्तित्व को सोचा नहीं जा सकता है। हमारी संस्कृति और सभ्यता कितने ही परिवर्तनों को स्वीकार करके अपने को परिष्कृत कर ले, लेकिन परिवार संस्था के अस्तित्व पर कोई भी आंच नहीं आई। वह बने और बन कर भले टूटे हों लेकिन उनके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता है।
हमारे देश भारत की परिवार व्यवस्था सद्गुणों की पाठशाला है जहॉ शिष्टाचार,सदाचार एवं संस्कारों का बीजारोपण बच्चों में सहजता से होता है ।पालि में लिखे जातक कथा महावेस्सन्तर जातक में कहा गया है,
"येन केनचि वण्णेन पितु दुक्खं उदब्बहे,
मातु भागिणिया चापि अपि पाणेहि अत्तनि।"
अर्थात्‌ मां, बहन और पिता का दुःख जैसे भी हो दूर करना चाहिए! यह तभी संभव है जब परिवार के सारे लोग परिवार की तरह रहें,एक संयुक्त परिवार की तरह। हां मत-भेद तो हों,पर मन-भेद नहीं।संयुक्त परिवार हमारी विरासत है और वर्षो से समाज की ताकत रहे है।अब भी याद आते हैं वो दिन जब संयुक्त परिवारों का चलन था। माता-पिता और भाई बहन के अलावा चाचा-चाची और दादा-दादी भी साथ ही रहते थे और भरे-पूरे घर में बच्चों की सबसे ज्यादा मौज रहती थी।धमाचौकड़ी करने पर एक ने डांटा,तो दूसरे ने पुचकार दिया। दिन भर कभी मां ने कुछ खिलाया, तो कभी दादी ने। नींद आई तो चाची ने लोरी देकर सुला दिया,लेकिन अब यह सब फिल्मों में या सपने में मिलता है। वक्त के साथ रिश्ते कम हो चले हैं। गांवों में तो अभी रिश्तों की कमी उतनी नहीं खलती, लेकिन महानगरों में तो जैसे रिश्तों का अकाल पड़ गया है।घर में शादी ब्याह और तीज-त्योहारों पर अपनों की याद आती है। लोग इन खास दिनों में अपनों के घर जाते हैं या उन्हें अपने घर बुला लेते हैं। हमारे देश में रिश्तेदारों से दूरियां बढ़े ज्यादा दिन नहीं हुए,लेकिन यूरोपीय देशों में एक अर्सा पहले ही रिश्तेदारों से दूरियां इतनी बढ़ गईं कि उन्हें अपने रिश्तेदार से मिलने के लिए एक खास दिन बनाना पड़ा। 18मई को विजिट योर रिलेटिव डे मनाया जाता है और इस दिन लोग फूल और मिठाइयां लेकर अपने अजीजों के घर जाते हैं।
हम चाहें तो भारतीय संस्कार की संयुक्त परिवार व्यवस्था से जुड्कर सुख शान्ति और आनन्द का जीवन जी सकते हैं । इसके लिये हमें सच्चाई का समर्थन तथा बुराई का अन्त करना होगा । मिलजुल कर रहना सीखना होगा ।आज भी संयुक्त परिवार को ही सम्पूर्ण परिवार माना जाता है,उम्मीद है जल्द ही समाज में परिवार की अहमियत दुबारा बढ़ने लगेगी और लोगों में जागरुकता फैलेगी कि वह एक साथ एक परिवार में रहें जिसके कई फायदे हैं!परिवार एक महत्वपूर्ण संस्था है। परिवार मतलब समाज का एक मजबूत स्तंभ जिसके ऊपर है एक अच्छे समाज के निर्माण की जिम्मेदारी क्योंकि सुखी परिवार तो अच्छा समाज। अब परिवार में खामोशी अपना असर छोड़ती जा रही है। दूर कीजिए इस खामोशी को और मजबूती दीजिए अपने परिवार को।
डॉ सरस्वती माथुर
ए - 2, हवा सड़क, सिविल लाइन्स-- जयपुर - 6

गुरुवार, 16 मार्च 2017

भगवान महावीर स्वामी का संदेश ---जिओ और जीने दो।
डाॅ सरस्वती माथुर
विश्व कों अंहिसा का पाठ पढानेवाले भगवान महावीर ने सत्य कि खोज में राजमार्ग कों त्यागकर कांटो भरा पथ  अपनाया. एवं स्वय के द्वारा जिएंगें का संदेश देकर सत्य कों नई परिभाषा दी ।
महावीर स्वामी जैन धर्म के चौंबीसवें तीर्थंकर है। करीब ढाई हजार साल पुरानी बात है। ईसा से 599 वर्ष पहले वैशाली गणतंत्र के क्षत्रिय कुण्डलपुर में पिता सिद्धार्थ और माता त्रिशला के यहाँ तीसरी संतान के रूप में चैत्र शुक्ल तेरस को इनका जन्म हुआ। इनका बचपन का नाम ‘वर्धमान’ था। ये ही बाद में स्वामी महावीर बने। महावीर को ‘वीर’, ‘अतिवीर’ और ‘सन्मति’ भी कहा जाता है।जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी अहिंसा के मूर्तिमान प्रतीक थे। उनका जीवन त्याग और तपस्या से ओतप्रोत था। उन्होंने एक लँगोटी तक का परिग्रह नहीं रखा। हिंसा, पशुबलि, जाति-पाँति के भेदभाव जिस युग में बढ़ गए, उसी युग में ही भगवान महावीर ने जन्म लिया। उन्होंने दुनिया को सत्य, अहिंसा का पाठ पढ़ाया। पूरी दुनिया को उपदेश दिए। उन्होंने दुनिया को पंचशील के सिद्धांत बताए। इसके अनुसार- सत्य, अपरिग्रह, अस्तेय, अहिंसा और क्षमा। उन्होंने अपने कुछ खास उपदेशों के माध्यम से दुनिया को सही राह दिखाने की ‍कोशिश की। अपने अनेक प्रवचनों से दुनिया का सही मार्गदर्शन किया।
जब मानव समाज विषमता और हिंसा के चक्रव्यू में फंसा हुआ था, ऐसे कठिन समय में भगवान महावीर ने "जियो और जीने दो" का संदेश जन साधरण तक पहुचा कर विश्व बन्धुत्व और विश्व शांति का मार्ग प्रशस्त किया.स्वयं जियो औरों को भी जीने दो प्रत्येक प्राणी जीना चाहता है, मरना नही- अतः प्राणी मात्र की हिंसा मत करो हिंसा में अधर्म, आत्म पतन होता है और अहिंसा में आत्म उत्थान होता है। असत्य बोलने का त्याग करना सौ सत्य धर्म के बराबर है. सभी दुख हिंसा से उत्पन्न होते है। ब्रम्हचर्य मोक्ष का सोपान होता है। इच्छा रहित होना अपरिग्रह है. भगवान महावीर के एैसे उपदेश आत्मा को परमात्मा से जोड़ने और विश्व शांति स्थापित करने में आज अधिक प्रासंगिक है।
अहिंसा परमोधर्माः आर्थात अहिंसा ही परम धर्म है। अहिंसा को केन्द्र मानकर भगवान महावीर ने सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रम्हचर्य जैसे महाव्रतों का उपदेश दिया था। अहिंसा से सत्य जुड़ा है. अहिंसा से ही अपरिग्रह संभव है। अहिंसा से विश्व शांति जुड़ी है। मानव ही नही प्रत्येक जीव का कल्याण अहिंसा पर आधारित है।भगवान महावीर भारतीय संस्कृति के ऐसे तीर्थंकर है, जिन्होंने जगत को जियो और जीने दो का सूत्र दिया। हर प्राणियों को स्वतंत्रता से जीने का अधिकार दिया है। स्वतंत्रता ही मानव की अमूल्य धरोहर है, ‘जियो और जीने दो’ का सह अस्तित्ववादी सूत्र विश्व समाज को सूत्र बद्ध करता है। लेकिन इक्कीसवीं शती के भूमण्डलीकरण, ग्लोबलाइजेशन, विश्वग्राम की एप्रोच में ‘वासुधैव कुटुम्बकम्’ या ‘जियो और जीने दो’ की अर्थ ध्वनि न होकर एक ऐसी पाश्चात्य गंध घुली मिली है, जिसका मूलाधार अर्थ है। जिसका मानव कल्याण या मानवीयता से उतना सरोकार नहीं है। भौतिकता की अंध दौड़ ने उदात्त तत्व को जीवन से निकाल फेंका है। महावीर द्वारा अपने प्रत्येक अनुयायी (साधु व गृहस्थ दोनों वर्गोंके लिए) के लिए अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्राह्मचर्य व अपरिग्रह इन पांच व्रतों का पालन अनिवार्य बताया गया है, परन्तु इन सभी में अहिंसा की भावना प्रमुख है. उनकी मान्यता है कि मानव व दानव में केवल अहिंसा का ही अंतर है. जब से मानव ने अहिंसा को भुलाया तभी से वह दानव होता जा रहा है और उसकी दानवी वृत्ति का अभिशाप आज समस्त विश्व भोगने को विवश है. संसार के प्रत्येक जीव को अपना जीवन अति प्रिय है. जो उसको नष्ट करने को उसको क्षति पहुंचाने को उद्यत रहता वह हिंसक है, दानव है. इसके विपरीत जो उसकी रक्षा करता है वह अहिंसक है और वही मानव है.यद्यपि कालान्तर में जैन धर्म के सिद्धान्तों का अक्षरश: पालन करना लोगों के लिए कठिन होने लगा फिर भी इसमें संदेह नहीं है कि महावीर स्वामी ने अपने समय में जिस अहिंसा के सिद्धांत का प्रतिपादन किया वह निर्बलता व कायरता उत्पन्न करने के बजाय राष्ट्र में शांति व अमन स्थापित करने के उद्देश्य से किया. उन्होंने तत्कालीन हिन्दू धर्म को दूषित बनाने वाली पशु  बलि जैसी कुप्रथा को रोककर सामाजिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त किया. उनका कहना था कि पशु हत्या ही नहीं, स्वार्थपरता, बेईमानी व धोखेबाजी भी हिंसा का ही रूप है. उन्होंने समाज को जियो और जीने दो का सूत्र दिया. उन्होंने लोगों से कहा कि तुम दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जो तुम दूसरों से अपने लिए चाहते हो।
भगवान महावीर एक ऐसा व्यक्तित्व है जिन्होंने आध्यात्मिक क्षेत्र में पूर्णता हासिल की। उनके लिए कुछ भी शेष न था और यह हम सभी का जीवन उद्देश्य भी होना चाहिए। भगवान महावीर का जन्म कल्याण के लिये हुआ था । वह कहते थे कि अहिंसा का मार्ग ही प्रत्येक मानव का धर्म होना चाहिए। अहिंसा को ग्रहण करने से मनुष्य कई प्रकार की व्याधियों से मुक्त हो जाता है। सभी धर्मों में अहिंसा को अलग-अलग प्रकार से परिभाषित किया गया है।
इसी तरह प्रभु महावीर ने नारी शक्ति को बराबरी का सम्मान दिलाया। नारी भी मोक्ष की अधिकारिणी है। साधना के जीवन में भी नारी काफी मात्रा में संयम जीवन अंगीकार कर रही है। इस तरह अनेक क्षेत्रों में चाहे वह शैक्षणिक, राजनीतिक, सामाजिक आदि सभी क्षेत्रों में नारी की कार्यप्रणाली प्रगति की ओर बढ़ रही है।भगवान महावीर ने नारी.उद्धार और उनके आत्म.कल्याण के लिए उपदेश दिया, मार्ग प्रशस्त किया। उनका मानना था कि आत्मा न पुरुष है और न स्त्री और प्रत्येक आत्मा को अपना उद्धार करने का समान अधिकार है। अतः उन्होंने अपनी मौसी चन्दनबाला को आर्यिका दीक्षा देकर उनको स्वतन्त्र संघ बनाने की प्रेरणा दी और उनके आत्म.कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। यह सौभाग्य की बात है कि जब भारत में ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व में भगवान महावीर का 2500वाँ निर्वाणोत्सव मनाया जा रहा था, उस समय हमारे देश की प्रधानमन्त्री एक महिला थीं श्रीमती इन्दिरा गांधी। 2500वें निर्वाणोत्सव को सफल बनाने में जैन समाज के लिए जो उनका योगदान रहा, उसको जैन समाज कभी भी नहीं भूल सकता। वापस लौटते हैं दो शब्दों पर -जीओ और जीने दो,  ये दो शब्द हैं किन्तु यदि देखें तो इन दो शब्दों में जिन्दगी का सार छिपा है .इन्सान, इन्सान के रूप में जन्म  तो लेता है किन्तु उसके कर्म इन्सानों जैसे नहीं होते  कई दफा तो वो अपने स्वार्थ खातिर इन्सानों का खून बहाने से भी नहीं चूकता .उसके कर्म जानवरों जैसे हो जाते हैं .कई बार तो इतना कूर और ज़ालिम हो जाता है कि जानवरों को भी मात दे जाता है .अपने स्वार्थवश वो अपनों का भी खून बहा देता है  यदि हम यह दो शब्द, जीओ और जीने दो , अपना लें तो यह धरती स्वर्ग हो जाएगी . इन दो शब्दों का तात्पर्य  है कि खुद भी जीयें औरों को भी शान्ति से उनको उनकी जिन्दगी जीने दें . क्यूँ हम लोग आज इतने स्वार्थी  हो गए है कि धर्म , जाती , प्यार के नाम पे इंसानियत का खून बहा रहे हैं प्यार करने वालों को अपनी इज्ज़त कि खातिर मार देते हैं जिसे' अोनर किलिंग का नाम दिया जाता है कभी धर्म कि खातिर लोगों को मारा जाता है  कौन सा धर्म है ,कौन  सा कोई धार्मिक ग्रन्थ है या कौन  से कोई देवी देवता ,गुरु , साधू , संत पीर पैगंम्बर हुए हों  जिन्होंने कहा हो  या कहीं लिखा हो कि धर्म के नाम पे लोगों कि हत्याएं करो. या कहीं लिखा हो कि प्यार करना गुनाह है  और प्यार करने वालों की बलि देदो आॅनर किलिंग '  के नाम पे हम क्यूँ आज इतने  कूर हो गए हैं जो ऐसे घिनोने कार्य करते हैं शान्ति से क्यूँ  नहीं रहते  . क्या मिलता है हमें ऐसे घिनोने कार्य करके  शान्ति से खुद भी रहें औरों को भी रहने दें , आज आवश्कता है इन दो शब्दों को अपनाने क़ी ' जीओ और जीने दो '।
भगवान महावीर के नाम पर प्रायः दो नारे लगाए जाते हैं-
जियो और जीने दो तथा अहिंसा परमो धर्मः की जय।

विश्वास कीजिए अहिंसा परमो धर्मः का सर्वप्रथम उल्लेख जैन धर्म के शास्त्रों में नहीं अपितु महाभारत के अनुशासन पर्व की गाथा ११५-२३ में मिलता है। जी हाँ, सत्य यही है-

अहिंसा परमो धर्मः, अहिंसा परमो तपः।
अहिंसा परमो सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते।
अहिंसा परमो धर्मः, अहिंसा परमो दमः
अहिंसा परम दानं, अहिंसा परम तपः
अहिंसा परम यज्ञः अहिंसा परमो फलम्‌।
अहिंसा परमं मित्रः अहिंसा परमं सुखम्‌॥
महाभारत/अनुशासन पर्व (११५-२३/११६-२८-२९)

अहिंसा परम धर्म है। अहिंसा ही परम तप है। अहिंसा ही परम सत्य है और अहिंसा ही धर्म का प्रवर्तन करने वाली है। यही संयम है, यही दान है, परम ज्ञान है और यही दान का फल है। जीवन के लिए अहिंसा से बढ़कर हितकारी, मित्र और सुख देने वाला दूसरा कोई नहीं है।
महावीर स्वामी के अनमोल कथन :

1. अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है।

2. शांति और आत्म-नियंत्रण अहिंसा है।

3. सभी जीवित प्राणियों के प्रति सम्मान अहिंसा है।

4. प्रत्येक जीव स्वतंत्र है, कोई किसी और पर निर्भर नहीं करता।

5. हर एक जीवित प्राणी के प्रति दया रखो। घृणा से विनाश होता है।

6. खुद पर विजय प्राप्त करना लाखों शत्रुओं पर विजय पाने से बेहतर है।

7. प्रत्येक आत्मा स्वयं में सर्वज्ञ और आनंदमय है। आनंद बाहर से नहीं आता।

8. किसी के अस्तित्व को मत मिटाओ। शांतिपूर्वक जिओ और दुसरो को भी जीने दो।

9. आत्मा अकेले आती है अकेले चली जाती है, न कोई उसका साथ देता है न कोई उसका मित्र बनता है।

10. स्वयं से लड़ो , बाहरी दुश्मन से क्या लड़ना ? वह जो स्वयम पर विजय कर लेगा उसे आनंद की प्राप्ति होगी।

11. पर दुख को जो दुख न माने,पर पीड़ा में सदय न हो। सब कुछ दो पर प्रभुकिसी को,जग में ऐसा हृदय न दो।

12. सभी मनुष्य अपने स्वयं के दोष की वजह से दुखी होते हैं , और वे खुद अपनी गलती सुधार कर प्रसन्न हो सकते हैं।

13. आपने कभी किसी का भला किया हो तो उसे भूल जाओ। और कभी किसी ने आपका बुरा किया हो तो उसे भूल जाओ।

14. आपकी आत्मा से परे कोई भी शत्रु नहीं है। असली शत्रु आपके भीतर रहते हैं, वो शत्रु हैं क्रोध, घमंड, लालच, आसक्ति और नफरत।

15. यदि तुम अपने शरीर या दिमाग पर दूसरों के शब्दों या कृत्यों द्वारा चोट बर्दाश्त नहीं कर सकते हो तो तुम्हे दूसरों के साथ अपनों शब्दों या कृत्यों द्वारा ऐसा करने का क्या अधिकार है ?

16. भगवान् का अलग से कोई अस्तित्व नहीं है।  हर कोई सही दिशा में सर्वोच्च प्रयास कर के देवत्त्व प्राप्त कर सकता है।

17. किसी आत्मा की सबसे बड़ी गलती अपने असल रूप को ना पहचानना है , और यह केवल आत्म ज्ञान प्राप्त कर के ठीक की जा सकती है।
प्रस्तुति
डाॅ.सरस्वती माथुर
ए-2,सिविल लाइन
जयपुर-6

गुरुवार, 25 अगस्त 2016

"भोर के रंग !"
जब जब बदलता है
भोर का रंग
हमारी उम्मीदें भी
रंगीन हो जाती हैं
विश्वास की एक कविता
मेरे अंदर
 सागर की लहरों सी
शब्दों की पतवार थाम कर
चलने लगती है
कहीं दूर पहुँच कर
सूरज का रंग जब
साँझ पर चढ़ने लगता है
हमें थाम कर
तब समय का हाथँ भी
नये कैनवास पर
नये आकार गढ़ने लगता है
तब बहुत याद आता है
मुझे हर माँ की आँखों में
हमें हर माँ की आँखों में
बच्चों के लिये जलता वह
रोशन दिया जो
उनके जीवन की
रोशनी बुनने के लिये
रात दिन कातता है
उमंगों का चरखा जिससे
निकले सूत
उनके इर्द गिर्द ऊर्जा की
एक सप्तरंगी डोर
लपेट कर उन्हें
सप्तरंगी आँचल में
 समेट लेते हैं
और बच्चे चहबच्चे से 
मुखर हो अपनी 
पहचान ढूंढनें लगते हैं 
...
डाँ सरस्वती माथुर 
२६.३.१६
2
हमें भी शामिल करो 
पृथ्वी की आबादी में 
हमने भी तो 
नापी हैं दूरियाँ 
जीवन में संघर्ष की 
फिर क्यों हमारे 
घर के चारों ओर 
कच्ची मिट्टी की दीवार 
चिन कर उसमें 
गाहे बगाहे छेद कर 
तांका झाँकी करते हो 





फिर मारते हो झपटा
क्यों आख़िर क्यों
हम कोई चील के 

पंजों में दबोचे 
चहे तो नहीं ?
हमें भी अच्छी लगती है 
धूप ,नदियाँ,पेड़,फूल
और उत्सवी जीवन के रंग
हमारे भी सपने हैं 
हमारा भी एक 
सतरंगी आकाश है 
जिसमें उगते हैं 
सूरज -चाँद 
जिसमें चमकते हैं तारे
 होती है रोज़ सुबह -शाम
फिर क्यों जब भी हमारी 
जीत होने लगती है 
सह नहीं पाते हैं आप
और बखेर देते हैं 
हमारे सभी सपने 

कैरम की गोटियों की तरह 
अपनी बदनीयती व 
अहम स्ट्राइकर दाग कर 
कोई बात नहीं 
अब दूर नहीं है वे दिन जब 
आप देखेंगे कि 
अंधकार होगा तो
हमारी मुटठी में बंद 
जुगनू के घेरों से 
झरती रोशनी 
आपका मार्गदर्शन करेगी 
हमारी एक आवाज़ से 
आपकी रूह डरेगी 
लेकिन हम वादा करते हैं कि
जीवन के हर मोड़ पर
आपके साथ हम खड़े रहेंगे
पर अपने अस्तित्व -अस्मिता को
अपमानित नहीं होने देंगे
क़तई नहीं होने देंगे।
डाँ सरस्वती माथुर

२६.३.१६
3म
मैं खिल ही जाऊँगी'
तुम कितने ही
रास्ते बदलो
मैं मिल ही जाऊँगी
फूल सा है
वजूद मेरा
झरूँगी सूख कर
पर बीज बन कर फिर से
खिल ही जाऊँगी
तुम एक उत्सवपूर्ण मौसम हूँ मैं
आती जाती रहूँगी
रूप बदल बदल कर
कभी पतझड़ कभी
बसंत कभी फाल्गुन
कभी सावन कहलाऊँगी
एक अदृश्य
बाँसुरी हूँ मैं
नि:शब्द रहकर भी
जीवन के ख़ूबसूरत
 पलों में देखना
मौन तोड़ गीत मे
लय के उन्मुक्त रंजन में
एक नया राग सुना कर
पहचान बनाऊँगी
तुम सुर होंगे मेरे शब्द साज
मेरी ध्वनि हवाओं की में उतर अनुगूँज  सी
मैं दूर तक जाकर फिल
   










शनिवार, 12 मार्च 2016

लघुकथाएं


लघुकथा :
 " लक्ष्मी का दीया !"आज फिर दीवाली का त्यौहार है ,बच्चे पटाखे फुलझडियाँ छुडा रहे हैंl दादी माँ भी गाँव से यहाँ इस अवसर पर आ गयीं थींlबच्चों ने दादी माँ के लिए बरामदे में कुर्सी लगा दी थी ताकि वह भी शहर की दीवाली की रंगीनियाँ देख सकेंlअस्सी साल की दादी माँ पोते पोतियों को देख रहीं थीं ,पास ही बहुएँ लैपटॉप खोले बैठी थीं ,छोटी बहू ने तुरंत ऑनलाइन एक डिस्काउंट वाला होटल खोज लिया था और अब फोन पर बुकिंग कर रहीं थीं l
पूजा हो चुकी थी, एक थाली में बाज़ार से लायी मिठाई ,नमकीन और फल चढ़ा कर मंदिर को छोटे लट्टुओं से सजा दिया था! बाहर मुंडेर पर भी छोटे छोटे रंगीन बल्बों की लडियां लटकीं थींl सब खुश थे बस दादी माँ सोच रही थीं ,कहाँ खो गए वो माटी के दिए ,खील बताशे ,लक्ष्मी माँ की पन्नियाँ , रसोई घर से उठी पूरे घर आँगन को महकाती पकवान की लार टपकाती खुशबू !सभी तैयार थे रेस्तरां जाने को lबहुओं ने लाइफ स्टाइल से सेल में खरीदीं नए जींस और टॉपर अमेरिकन ज्वेलरी के साथ पहन रखीं थीं l घर आँगन में रौनक थी पर न नाते रिश्तेदार थे न पहले सा अपनापन, बाहर पटाखों का कानफोडू शोर था, रेस्तरां में भी गजब की भीड़ थीl सभी खुश थे दादी माँ भी सर पर पल्लू लिए बैठीं थीं, भोंचक्की सी इधर उधर देख रहीं थीं l सब चटकारे ले लेकर पिज़्ज़ा ,नूडल्स ,और सिज्लर खा रहे थेl बच्चों के साथ थी दादी माँ पर न जाने क्यों मन वहां से दूर गाँव में था और वह सोच रहीं थी कि पड़ोस की नारंगी काकी ने लक्ष्मी की पूजा करके खीर पूड़ी का भोग लगा कर उनके आवाहन के लिए रात भर जलने वाला दिया अब तक जरुर जला दिया होगा!
डॉ सरस्वती माथुर
आँगन की तुलसी 
नववर्ष का पहला दिन था । सर्द भिनसार ने अभी अपनी आँखें खोली ही थी पर  ओम-रंजनी के घर में आज भी रोज की तरह बहस जारी थी। रंजनी को कौतूहल नहीं हुआ ा  यह तो अब रोज़ की कहानी थी ।पूजा घर से रंजनी की सासू माँ के स्वर  में आरती के बोल-"जय जगदीश हरे "गूँज रहे थे।
उन बोलों के साथ जगदीश बाबू  के स्वर अलग ही ताल मिला रहे थे--"बहू को नोकरी पर भेजते हो, आख़िर ज़रूरत क्या है? तुम्हारी माँ  अठावन साल की उम्र में रसोई घर में खटती हैऔर मैं यहाँ बंध कर रह जाता हूँ ।यह कब तक चलेगा? रिटायर हुए छह माह हो गये , यह सोच कर यहाँ आया था कि ताजीवन  तुम लोगों से नौकरी के चक्कर में दूर रहा ,अब यहाँ हूँ तो बहू के हाथ का गरम गरम खाना खाऊँगा , आराम करूँगा पर यहाँ तो नाटक ही दूसरा है ।"
यह सारी बातें जगदीश बाबू अपने बेटै ओम को सुना कर कह रहे थे । उस वक़्त ओम दफ़्तर के लिये तैयार हाे रहा था ,धीरे  से बोला -"  बाबा आज की ज़रूरत है महिलाओं की नौकरी ,हम पर ज़िम्मेदारियाँ है,आमदनी इतनी नहीं कि रोज़मर्रा की ज़रूरतें अकेले पूरा कर सकूँ , रजनी  पढ़ी लिखी है , सहयोग करती है , बाबा क्या बुरा है ?फिर आपका तो सारा काम निपटा कर दफ़्तर जाती है , आपका पूरा आदर करती है , फिर कुछ ही दिनो की बात है , अब आप शान्त हो जाओ ।"
इसी शोर शराबे के बीच आरती ख़त्म करके ओम की माँ आगई और पति को समझाने लगी -"अजी सुनते हो,रोज़ ही बिना बात खिटपिट करते हो,कल से सेंट्रल पार्क में घूमने चलेंगें जी ।"
फिर बेटे के आरती देते हुये माँ बोली-"ना बेटा , इनकी बात पर कान ना धरना , रिटायर होने के बाद से जरा अकेला महसूस करते हैं।"
" हाँ माँ ,आप ध्यान रखना, फिर भी ज़्यादा हुआ तो रजनी नोकरी ही छोड़ देगी।"
यह कह कर भारी मन से ओम नाश्ता करने लगा।
अगले दिन जब रजनी जागी तो उसे बड़ा कौतूहल  हुआ ,घर में आवाज़ें नहीं थी बल्कि सन्नाटा था ।वह चौंकी ,बाहर आयी , ओम शेव  बनाते हुवे गुनगुना रहा  था  । 
रजनी  को हैरान देख कर बोला-"माँ बाबा को घुमाने ले गयीं हैं ।"
"औह अच्छा !"...रजनी ने चैन की साँस ली
और मन ही मन जगदीश बाबू ने सोचा कि सूर्य पूजन के इस पावन पर्व पर जिस तरह  सूर्य अपनी दिशा बदलता है वैसे ही 
 कुछ दिनों से अब घर में ज़रा शांित रहने लगी थी।
समय चक्र चलता रहा ।जगदीश बाबू के सैर पर जाने से भी कुछ नये दोस्त बनने लगे । धीरे धीरे उनका मन बहलने लगा ।
 मकर संक्रान्ति का पर्व  पास आ गया  था,इसलिये  चारों आेर से पतंगों का शोर गूँजने लगा था , वो   काटा वो मारा ,ढील दो भाई ढील दो  जाने दो भाई जाने दो का कानफाडू शोर वातावरण में जोश भर जाता था ।
सर्दी ने भी पंख पसार लिये थै। एक दिन जगदीश बाबू भी इस सर्दी  की चपेट में आ गये । तेज़ बुखार और पेट केनिचले हिस्से में बार बार दर्द उठने की वजह से उन्हें अस्पताल में भरती करना पड़ा । बहुत से टेस्ट हुये  और मालूम पडा िक प्रोस्टेट  कैंसर के कुछ संकेत मिलरहें हैं ,शुरुआत है अत: तुरन्त आपरेशन करना पड़ेगा । हिसाब लगाया गया तो स्पष्ट  हुआ कि अच्छा ख़ासा ख़र्चा लगेगा । जगदीश बाबू की जमा पूँजी से सारा काम नहीं हो पा रहा  था, तभी रजनी बाेलीं-" बाबा आप चिन्ता ना करें , मैं अपने पी. एफ . से लोन ले लूँगी ,अच्छे अस्पताल में आपका इलाज करवायेंगे ,सब ठीक हो जायेगा ।कल ही अप्लिकेशन लगाती हूँ , बाबा दस दिन में लोन मंज़ूर हो जायेगा ।"
जगदीश बाबू में रजनी को देखा ,उन्हें लगा जैसे बेटी के रूप में कोई देवी सामने खड़ी है। उनकी आँखें भर आई।तभी माँ की  आवाज़ गूँजी -"देखा ओम के बाबा ,बहू बेटी से भी बढ़ कर होती है। क्या आपको अब भी बहू की नौकरी से एतराज़ है?
जगदीश बाबू ने हाथ जोड़ कर कहा -"मुझे माफ़ करना बहू छह महीनों से मैं घर में कलेश कर रहा था , बहुत ग़लत कर रहा था  , शमिंदा हूँ ।"
रजनी की आँखें भी भर आई-"एेसा ना कहें बाबा,आपका आशीर्वाद हम पर हमेशा रहे।यही हमारा सौभाग्य है !"
जीवन में पहली  बार जगदीश बाबू को लगा कि आत्मनिर्भर महिलायें घर की नींव की मज़बूत ईंट होती है ।नारी का स्वतन्त्र अस्तित्व ही उसकी पहचान होती है ,  वह सही मायने में शक्ति का वट वृक्ष   होती है...वह घर आँगन की  पावन 
तुलसी होती है ! 
अब जगदीश बाबू को अपनी सोच बदलनी होगी और नारी की भूमिका को समझना होगा तभी परिवारऔर समाज का 
विकास होगा । अब जगदीश बाबू का मन फूल सा हल्का हो गया था । 

इस बार का नया साल भी   पाहुन सा परिवार के लिये अनूठी प्रेम के गुलाबों सी महकती ख़ुशबू लेकर आया था!
डाँ सरस्वती माथुर 
...."आ री कनेरी चिड़िया!"
मीठी मात्र आठ साल की थी जब घर के अहाते के एकदम बाहर बरवाड़ा हाउस सोसाइटी ने  पीले कनेर के 10 पेड़ रोपे थे  !अभी भी याद है गायत्री देवी को जब गर्मियों में गरम हवाओं के झोंके तन को गरम कर देते थे तो कनेर की नूकीली पंखियाँ चँवर सी झूल कर मौसम को खुशनुमा बना देती थी !शुरू शुरू के वो दिन गायत्री देवी की यादों में आज भी ताजा हैं ,,,,बरवाड़ा सोसायटी का यह अहाता तब बच्चों   के क्रिकेट का मैदान था ,गर्मी की लू से बेपरवाह रहते हुए दिन भर धमाचौकड़ी होती थी! वहाँ खेल कूद करते बच्चे कनेर के इस पेड़ के नीचे बैठ कर थकान मिटाते थे ,इसके पीले पीले फूल जब डाल  से छूट कर बच्चों के उपर आ गिरते थे तो मौसम में बसंत छा जाता था l उन फूलों को एक दूसरे पर उछाल कर सभी मिल कर एक स्वर में गाते थे ----"आ री कनेरी चिड़िया ...गा री कनेरी चिड़िया ....शिवजी के मंदिर में फूलों को जाकर चढ़ा री कनेरी चिड़िया .....आ री कनेरी चिड़िया ...!" यह किसी प्रदेश का लोकगीत था जो भोलू ने अपनी दादी से सीखा था और सब की जबान पर चढ़ गया था !
गायत्री देवी जब तक बरवाड़ा हाउस के इस अहाते में रहीं पूजा में कनेर के फूलों को नियमित चढाती रहीं lफिर वह अपने छोटे बेटे के पास विदेश चली गईं lबड़ा बेटा अभी भी बरवाड़ा हाउस ही में रहता है ,वे आती जाती रहती हैं !इस बार का आना विशेष मायने  रखता है ,वह मीठी की शादी में पूरे परिवार के साथ शामिल होने आई हैं !मीठी जो उनकी लाड़ली पोती है ,ला की पढ़ाई खत्म करके अब प्रैक्टिस कर रहीं हैं ! चोबीस वर्ष की हो चुकी हैं मीठी !गायत्री देवी इस बार भारत 
लगभग पाँच वर्ष बाद आईं हैं ! इस बार विशेष रूप से यहाँ की संरचना में उन्हे बड़ा बदलाव लगा, वह हैरान भी थीं और दुखी भी कि गगनचुंबी इमारतें बनाने के चक्कर में बरवाड़ा हाउस ही नहीं पूरे शहर की काया पलट के फलस्वरूप यहाँ 
की सुंदरता भी तहस नहस हो गयी हैl कल की सी बात लगती है जब अहाते के आस पास का सौंदर्य अप्रतिम था ...वह
कैसे भूल सकतीं हैं कि भोर होते ही यहाँ चिड़ियाएं नए नए राग छेड कर सभी को जगाती थी  और अब देखो तो जगह जगह से डालें काट दी गईं हैं ...कनेर जो हर रंग में अपनी आभा बिखेर के मन मोह लेते थे उदास खड़े हैं ,कनेर जो मंदिर का दर्शन थे ,जो हवाओं की आहटों के साथ थिरकते थे ,मौन खड़े हैं, कनेर जो मंदिर का दर्शन हैं ,विष पीते हुए मंदिरों में 
अमृत बरसाते हैं ,शिव जी पर चढाये जाते हैं ,वहाँ की  रचना का दर्शन हैं  ...वहाँ की अभिव्यक्तियों का जीवन मकरंद हैं 
...जो हवाओं की दस्तकों के साथ घण्टियों की तरह बजते से लगते हैं, सद्भाव आस्था का भाव जगाते हैं ,आज चीख चीख कर कह रहें हैं कि हमे न काटो, हमें बचाओ ,हम तो इन आहतों की देहरी के रखवाले हैं, प्रहरी हैं ,पर्यावरण के रक्षक हैं l
गायत्री देवी उन्हे बड़े दार्शनिक मनोभाव से एकटक जब निहार रहीं थीं तो मीठी उनके पास आ खड़ी हुईं ---"प्रणाम दादी, आपका जेट लेग पूरा हुआ या नहीं ?"
-"अरी कहाँ बिटिया, देख न नींद ही उड गयी है मेरी तो, देख न मीठी कितनी बेदर्दी से नोचा है इन कनेर की डालियों को , बांसुरी सी लहराती थी कभी ,जगह जगह से काट दी गयी हैं अभी....चिड़ियों का बसेरा तक नहीं दिख रहा Iगायत्री देवी की आवाज़ में भी दर्द था जिसे मीठी ने भी महसूस किया!
"अरे दादी जान सोसाइटी वालों ने तो इसे काटने के आदेश तक दे दिये थे वो तो मैंने सभी सदस्योंI के हस्ताक्षर ले कर नोटिस देकर इन्हे रोका है  स्पष्ट निर्देश निकलवाये  हैं कि इन्हे न काटा जाये बल्कि इमारत जो बन रही है उसकी बनावट में इन पेड़ों की परिधि छोडी  जाये।इन ओरर्ननामेंटल पेड़ो की सीमा रेखा छोड़ते हुए ही नक्शा पास करवाया जाये,स्टे ले लिया है, केस चल रहा है अभी॥"
गायत्री देवी ने स्नेह से मीठी की आँखों में देखा,सोचा सच कितनी समझदार होगयी है मीठी... यह बच्ची ,पर्यावरण  का संरक्षण  ही नहीं कर रही   है बल्कि  हरियाली जो प्रकृति का अनुपम शृंगार होती
उसे भी बचाने के जीवट संघर्ष मेँ जुटी है ...तभी तेज हवा का झोंका आया तो साथ में हवाओं की बौछार के साथ पीले 
कनेर के बहुत से फूल गायत्री देवी के इर्द गिर्द बिखर कर वातावरण को मनमोहक सुगंध से भर गये, तन के साथ साथ 
मन को भी सुवासित कर गये! देर तक गायत्री देवी के कानो में गूँजते रहे यह मधुर स्वर....".आ री कनेरी चिड़िया ...गा री कनेरी  चिड़िया........!
डॉ सरस्वती माथुर
लघुकथा
" लक्ष्मी आई है !"
रवीन्द्र हॉल खचाखच भरा था- सबको इंतज़ार था दर्शना जी का, जो आज मातृत्व दिवस पर आमंत्रित थीं l वह सज़ग नारी संस्था की अध्यक्षा थींl उनकी ओजस्वी वाणी सबको प्रभावित करती थी... .आज वह " माँ की भूमिका' पर बोल रहीं थीं ,उनका मानना था की घर कि सर्वोत्तम सत्ता के रूप में बच्चे पहले अपनी माँ को जानते और सर्वेसर्वा मानते हैं.... .आज समय बदला है, तो माँ कि भूमिका भी बदली है क्यूंकि वह अब घर की चारदीवारी लाँघ बाहर आ गयी हैl दर्शाना जी ने मेज़ पर रखे गिलास का पानी एक साँस में पिया और एक गहरा साँस लेकर फिर कहना शुरू किया ---
"विश्व के समग्र यथेष्ट विकास के लिए नारी को विकास कि मुख्य धारा से जुडा होना परम आवशयक है, नारी की  स्थिति समाज में मजबूत ,सम्मानज़नक ,सक्रिय होगी तभी समाज मजबूत होगा l Lनारी समाज का आइना है और माँ के रूप में उसका बहुत योगदान है....... उसे चाहिए लड़के और लड़की में भेदभाव न करेंL लड़की को भी लड़कों की  तरह ही शिक्षित करें... लड़की तो लक्ष्मी स्वरूप होती हैं.... मेरे भी दो प्यारी प्यारी पोतियाँ हैं l मैं तो उन्हें ही घर का चिराग मानती हूँ !"
तालियों की गडगडाहट से हॉल गूँज उठा l तभी फोन क़ी घंटी बज उठीl छोटे बेटे ने माँ को खबर दी कि भाभी को प्रसव पीड़ा शुरू हो गयी थी तो अस्पताल ले गए हैं ,. आप जल्दी पहुँचो !. भाषण वहीँ ख़त्म करके ,दर्शना भागती हुई सी अस्पताल की तरफ तेजी से बढ़ गयीं l तभी वार्ड की  तरफ से आते पति को देखा तो ठिठक कर रुक गयीं .."क्या हुआ जी ?"
" बेटी हुई है .."पति ने खबर दी l
दर्शना ने इश्वर को धन्यवाद् देते हुए कहा की चलो सब काम अच्छे से निपट गया... और मन ही मन बुदबुदाई ..."मेरे घर लक्ष्मी आई है !"और वह तेजी से पोती को देखने चल दीं !

2

सूखा मेवा
इस वर्ष राजस्थान में सूखा पड़ा l मुख्यमंत्री से लेकर संतरी तक सभी चिंतित थे l राहत पर विचार गोष्टियाँ संपन्न की गयीं l वातानुकूलित कक्षों में चाय नाश्ते के खान- पान के आयोज़नो के साथ सूखे की विभीषिका दर्शाती चित्रों की प्रदर्शनियां लगाई गयींl
तभी दीवाली आ गयी और प्रकाश के इस त्यौहार पर अँधेरा रखा जायेगा इस समाचार को अखबार की सुर्खियाँ बनाया गया !
मंत्रियों ने भी दीपावली पर स्वागत सत्कार के प्रबंध में कटौती करने की जोर शोर से घोषणा की l  एक मंत्री महोदय जो मेहमाननवाज़ी के लिए प्रसिद्ध थे ,उन्होंने भी सूखे के कारण राज्य पर आये संकट को महसूस किया और अपने पी . ए. को विशेष आदेश दिया ,"इस बार किसी भी तरह की मिठाइयाँ और पकवान न रखे जाएँ -"
पी .ए . साहब ने अचकचा कर पूछा -"क्यों सरकार ?"
"पता नहीं तुम्हे हमारे राज्य में सूखा पड़ा है ?"
पी .ए.साहब ने अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूकता दिखाते हुए कहा -"ठीक है साहेब तो ऐसा करेंगे की दो चार प्लेटो में "सूखे मेवे" लगवा देंगे lचाय तो हो ही जाएगी! "
यह सुनकर मंत्री महोदय गदगद हो गए lपी. ए .साहब की तारीफ करते हुए कहने लगे -"वाह , तुम्हारी वज़ह से मुझे किसी भी बात की चिंता नहीं रहती !"
डॉ सरस्वती माथुर
 ए -२ ,सिविल लाइन
,जयपुर -६
 ०१४१-२२२९६२१

"सोने की नसरनी!"
"अरे कलमुही  बेटा   जनती तो हम भी सोने की नसरनी चढ़ते"  ( बेटा होने पर घर के बुजुर्गों को एक सीढ़ीनुमा  सोने की सीढ़ी पर अंगूठा छुआ कर आदर देने का फंक्शन कि वंश बढ़ा!)
   प्रसव के बाद लौटी बहू को ताना   देते हुए पड़दादी ने कहा तो उसकी आँखें भर आई ! पास ही खड़ी दादी ने मालिश करने आई दाई माँ को सुनाते हुए कहा --"अरी  भंवरी, सवा महीने की  पूजन के साथ एक फंक्शन और रखा है  पूरे मोहल्ले को न्योता देना है, आ लिस्ट बना लें !"
  " कैसा फंक्शन बीबीजी?" हथेली पर तम्बाकू  मसलती  भँवरी  ने  पूछा
" अरी   तीसरी पीढ़ी का प्रतित्निधित्व कर रही है मेरी पोती, क्या मोहेल्ले को लड्डू नहीं खिलाऊंगी?  बड़ी धाय को भी तो  सोने की नसरनी चढ़ा कर मान सम्मान दूँगी ना ! "बहू की आँखें फिर भर आयी, पर यह आंसूं ख़ुशी के थे, उन्होंने कृतज्ञता से सासू माँ की तरफ देखा, पड्दादी निशब्द  रह  अगले बगले झाँकने लगीं !
 डॉ सरस्वती माथुर
 ए  -२ सिविल लाइन्स जयपुर -६ 
 
        लघुकथा
"हिंदी दिवस पर थैंक यू !"
एक बार हिंदी दिवस समारोह में एक प्रतिष्ठित कवि को अध्यक्ष की हैसियत से आमंत्रित किया गया l समारोह धूमधाम से संपन्न हुआ l इस समारोह में हिंदी की महत्ता पर विशेष जोर दिया गया , बार बार दोहराया गया कि हिंदी हमारी मातृभाषा है ,हमे हिंदी का प्रयोग ही करना चाहिए l अंत में अध्यक्ष महोदय ने भी हिंदी कितनी सार्थक राष्ट्रीय भाषा है ...इस पर जोर देते हुए अपना अध्यक्षीय भाषण समाप्त किया l
समारोह में अध्यक्ष महोदय का दस वर्षीय बेटा भी मौजूद था l उस पर भी हिंदी भाषा के प्रयोग का खूब प्रभाव पड़ा ! कार में बैठते समय बड़ी विनम्रता से अयोज़कों के एक मुख्य सदस्य को उनके बेटे ने बड़ी विनम्रता से कहा --"धन्यवाद, अंकल जी , सच आज मुझे बहुत अच्छा लगा l "
अध्यक्ष महोदय ने बेटे को चिकौटी काटते हुए समझाया ,"थैंक यू बोलतें हैं बेटे ...!"
डॉ सरस्वती माथुर    

Res

Ye story aapne kahin aur bheji to nahi

shalini



On 9/24/2014 12:10 PM, J.L Mathur wrote:
लघुकथा :
"करवा चौथ का चाँद !"
करवा चौथ का दिन था! चारों तरफ चहल पहल थी , आकाश बादलों से घिरा था ,चाँद निकलने के कोई आसार नहीं दिख रहे थे ,आज सुबह से ही बूँदा बाँदी हो रही थी! कृष्ण निकुंज का दालान हर  साल की तरह इस वर्ष भी इस पर्व का आयोजन कर रहा था! इस निकुंज में दस फ्लैट थे,जिनमे सभी भारतीय परिवार के लोग थे !  बड़ा उल्लसित करने वाला नजारा रहता थाl सजी धजी महिलाओं के समवेत स्वर और खिलखिलाहट से दालान गुंजायमान हो उठता था ! करवे   और थाल से सजी थालियाँ लिए महिलाए बार बार आकाश को निहारतीं और उनके पति भी बैचैनी से इधर उधर डोलते रह रह कर घडी देखते अखबार के अनुसार इस ८.१० पर चाँद निकलने की संभावना थी ! डीजे   पे  चल रहा था..." आज है करवा चोथ सखी री... "ठुमके पे
थिरक रही महिलाओं में गज़ब का उत्साह था!
श्रीकान्त स्वामी जी भी इस निकुंज  के दूसरे  फ्लोर पे रहते थे उनकी बहू का पहला करवा चौथ था इसलिए उनकी दादी माँ कल्याणी देवी   विशेष रूप से गाँव से आयीं थीं , वह भी इस बदलते स्वरुप को एक कुर्सी पर  बैठी देख रहीं थीं !हैरान भी थी कि किसी भी घर से पकवान मठरी की खुशबू नहीं आ रही थी, सभी के पैकेट कैटरर ने बना दिए थे, कोई प्यासी नहीं थीं, सब कॉफ़ी कोक की चुस्कियां ले रहीं थीं ,अब पति कैसे पानी पिला के व्रत खोलेगे, कल्याणी देवी कुछ कुछ समझ नहीं पा  रहीं थीं ,लेकिन वे मुस्करा रहीं थीं ,उन्हें अपना गाँव भी याद आ रहा था ,जहाँ के हर घर से मठरी पूवे   की खुशबू आ रही होगी और वह हैरान सी सोच रहीं थीं  कि इस अवसर पर तो बादल इतने नहीं होते थे! प्रकृति ने भी रूप बदला है! तभी दूरदर्शन पर न्यूज़ रीडर ने  घोषणा की कि चाँद निकल आया है लेकिन बादलों के कारण बहुत से प्रदेशों में नज़र नहीं आएगा, आप चाहें तो हमारे मॉनिटर पर चाँद देख कर व्रत खोल सकतें  हैं ! फिर क्या था सभी ने टी॰वी॰ के चाँद को अर्क देकर सभी औपचारिकताए पूरी कर लीं थी , जिनके पति बाहर थे उन्होने लैपटाप पर फ़ेस टाइम कर लिया था और व्रत खोल लिया था .... इस बीच डीजे  के स्वर तेज हो गए थे  .. हंसी मज़ाक के साथ .खाने पीने का दौर चल रहा था ,सभी केटरर  के खाने का लुत्फ उठा रहे थे, श्री कान्त स्वामीजी  की दादी माँ कल्याणी देवी   का चाँद पर अभी नहीं निकला था, उनके पति  झाईं गाँव में सरपंच थे, किसी विशेष कार्य के कारण आ नहीं पाये थे  ,कल्याणी देवी को उनकी बहुत याद आ रही थी ,वो अपने पति की तस्वीर के सामने बैठी पूरी रात खिड़की के पास खड़ी अपने गाँव वहाँ की परम्पराएँ पुए- पूड़ी कि खुशबू के बारे में सोचती रहीं थीं और आकाश पर दिखने वाले चौथ के चाँद का इंतज़ार करती रहीं थीं ! 
डॉ सरस्वती माथुर







Sent from my iPhone

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

"गणगौर का सांस्कृतिक पर्व !".....डाँ सरस्वती माथुर

 
 

फ़ाइनल आलेख
"गणगौर का सांस्कृतिक पर्व !"
डॉ सरस्वती माथुर
गणगौर का पर्व होली खेलने के बाद शरीर पर लगे रंग छूट भी नहीं पाते , होली के मदभरे मधुर गीतों के बोल समाप्त भी नहीं हो पाते कि सुहागिने और कुंवारी कन्याएं गणगौर के स्थान पर मांडने बनाने में जुट जाती हैंlगणगौर रँगीले राजस्थान के मुख्य पर्वोँ मेँ से एक है । जिसका सम्बन्ध श्री पार्वती पूजा से है । हिन्दू धर्म मेँ स्त्रियाँअपनी मनोकामनाओँ की पूर्ति के लिये देवी पार्वती की आराधना करती हैँ । होली के अगले दिन ही गणगौर की पूजा शुरू हो जाती हैं।होलिका दहन के दूसरे दिन गणगौर पूजने वाली बालाऐं होली दहन की राख लाकर उसके आठ पिण्ड बनाती हैं एवं आठ पिण्ड गोबर के बनाती हैं तथा उन्हें दूब पर रखकर, कनेर के पत्ते , पुष्प आदि सेप्रतिदिन पूजा करती हुई बड़े सवेरे ही होली की राख को गाती-बजाती स्त्रियाँ अपने घर लाती हैं। मिट्टी गलाकर उससे सोलह पिंडियाँ बनाती हैं, शंकर और पार्वती बनाकर सोलह दिन बराबर उनकी पूजा करती हैं।शीतलाष्टमी तक इन पिण्डों को पूजा जाता है, फिर मिट्टी से ईसर गणगौर की मूर्तियाँ बनाकर उन्हें पूजती हैं तथा दूब , कनेरके पत्ते , पुष्प आदि से 16 दिन तक इनकी पूजा की जाती है ... गणगौर की पूजा से पहले दीवार पर सोलह बिंदिया कुंकुम की, सोलह बिंदिया मेहँदी की और सोलह बिंदिया काजल की प्रतिदिन लगाती हैं। कुंकुम, मेहँदी और काजल तीनों ही श्रंगार की वस्तुएँ हैं। सुहाग की प्रतीक हैं। शंकर को पूजती हुई कुँआरी कन्याएँ प्रार्थना करती हैं कि उन्हें मनचाहा वर प्राप्त हो। शंकर और पार्वती को आदर्श दंपति माना गया है। दोनों के बीच अटूट प्रेम है। सोलह दिन के पूजन के बाद गणगौर उत्सव मनाया जाता है! इस दिन घर-घर में विवाहिता स्त्र्यिाॅं ब्रत रखती हैं पूजा कर व्रत खोलती हैं।
गणगौर की कहानी भी इस दिन पूजा के समय कही जाती है। एक समय भगवान शंकर, पार्वती जी नारदमुनि को साथ लेकर पृथ्वी पर चल दिए। भ्रमण करते-करते वे तीनों एक गाँव में पहुँचे। उस दिन चैत्र शुक्ला तृतीय की तिथि थी। गाँव के लोगों को जब शंकर जी और पार्वती जी के आगमन की सूचना मिली तो धनी स्त्रियाँ उनके पूजनार्थ नाना प्रकार के रुचिकर भोजन बनाने में लग गई और इसी कारण उन्हें काफी देर हो गई। दूसरी ओर निर्धन घर की स्त्रियाँ जैसी बैठी थीं, वैसे ही थाल में हल्दी, चावल, अक्षत तथा जल लेकर शिव-पार्वती पूजा के लिए वहाँ पहुँचीं। अपार श्रद्धा-भक्ति में निमग्न उन स्त्रियों को पार्वती ने पहचाना और उनकी भक्तिरूपी वस्तुओं को स्वीकार कर उन सब के ऊपर सुहागरूपी हल्दी छिड़क दी। इस प्रकार गौरी मातेश्वरी से आशीर्वाद और मंगलकामनाएँ प्राप्त करके वे महिलाएँ अपने-अपने घर चली गई। तत्पश्चात कुलीन घरों की स्त्रियाँ सोलह शृंगार कर छप्पनों प्रकार के व्यंजन थाल में सजाकर आई,तब भगवान शंकर ने शंका व्यक्त कर पार्वती जी से कहा कि तुमने तमाम सुहाग प्रसाद तो साधारण स्त्रियों में बाँट दिया है, अब इन सबको क्या दोगी? पार्वती जी शिव जी ने कहा 'आप इसकी चिंता छोड दें। पहले मैंने केवल ऊपरी पदार्थों से निर्मित रस दिया है, इसलिए उनका सुहाग  धोती से रहेगा, परन्तु इन लोगों को मैं अपनी चीरकर रक्त सुहाग  रस दूँगी, जिससे यह महिलाएँ मेरे समान ही सौभाग्यशालिनी बन जाएँगी। जब कुलीन स्त्रियाँ शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना कर चुकीं तो देवी पार्वती ने अपनी उँगली चीरकर उसके रक्त को उनको ऊपर छिड़क दिया और कहा कि तुम लोग वस्त्राभरणों का परित्याग कर मायामोह से रहित रहो तथा तन-मन-धन से पति की सेवा करती रहो तथा अखंड सौभाग्य को प्राप्त करो। भवानी का यह आशीर्वचन सुनकर प्रणाम करके ये महिलाएँ भी अपने-अपने घर को लौट गई तथा पति परायण बन गई। जिस महिला के ऊपर पार्वती देवी का खून जैसा गिरा उसने वैसा ही सौभाग्य प्राप्त किया। इसके पश्चात पार्वती जी ने पति के आज्ञा से नदी में जा कर स्नान किया तथा बालू मिट्टी का महादेव बनाकर पूजन किया, भोग लगाया और उसकी परिक्रमा करके बालू के दो कणों का प्रसाद खाकर पार्वती ने मस्तक पर टीका लगाया। उसी समय बालू मिट्टी के बने महादेव की मूर्ति से स्वयं शिव जी प्रकट हुए तथा पार्वती को वरदान दिया कि आज के दिन जो स्त्री गौरादेवी की पूजन तथा व्रत करेगी उसके पति चिरंजीव रहेंगे। इस प्रकार गणगौर का पर्व महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य का प्रतीक और गणगौर का व्रत उनकी साधना का फल प्राप्त करने वाला लोकपर्व बन गया है दोपहर को गणगौर के भोग लगाया जाता है तथा गणगोर को कुँए  से लाकर पानी पिलाया जाता है। लड़कियाँ कुँए  से ताजा पानी लेकर गीत गाती हुई आती हैं:-
’’ईसरदास बीरा को कांगसियो म्हे मोल लेस्यांराज,
रोंवा बाई का लाम्बा-लाम्बा केश, कांगसियों बाईक सिर चढ्योजी राज।’’
’’म्हारी गौर तिसाई ओ राज घाट्यारी मुकुट करो,
बीरमदासजी रो ईसर ओराज, घाटी री मुकुट करो,
म्हारी गौरल न थोड़ो पानी पावो जी राज घाटीरी मुकुट करो।’’
लड़कियाँ गीतों में गणगौर के प्यासी होने पर काफी चिन्तित लगती है एवं वे गणगौर को शीघ्रतिशीघ्र पानी पिलाना चाहती है। पानी पिलाने के बाद गणगौर को गेहूँ चने से बनी ’’घूघरी’का प्रसाद लगाकर सबको बांटा जाता है और लड़कियाँ गाती हैं:-
’’महारा बाबाजी के माण्डी गणगौर, दादसरा जी के माण्ड्यो रंगरो झूमकड़ो,
लगायोजी - ल्यायो ननद बाई का बीर, ल्यायो हजारी ढोला झुमकड़ो।’’
रात को गणगौर की आरती की जाती है तथा लड़कियाँ नाचती हुई गाती हैं:-
’’म्हारा माथान मैमद ल्यावो म्हारा हंसा मारू यहीं रहवो जी,
म्हारा काना में कुण्डल ल्यावो म्हारा हंसा मारू यहीं रहवोजी।’’
गणगौर पूजन के मध्य आने वाले एक रविवार को लड़कियाँ उपवास करती हैं। प्रतिदिन शाम को क्रमवार हर लडक़ी के घर गणगौर ले जायी जाती है, जहाँ गणगौर का ’’बिन्दौरा’’ निकाला जाता है तथा घर के पुरुष लड़कियाँ को भेंट देते हैं। लड़कियाँ खुशी से झूमती हुई गाती हैं:-
’’ईसरजी तो पेंचो बांध गोराबाई पेच संवार ओ राज महे ईसर थारी सालीछां।’’

गणगौर से एक दिन पहले नव विवाहितों के ससुराल से सिंजारा आता हैं जिसमें गहने कपडे उपहार आदि होते हैं।गणगौर उत्सव में पारंपरिक गीतों की घूम रहती हैं। नाचना और गाना तो इस त्योहार का मुख्य अंग है ही। घरों के ऑंगन में, सालेड़ा आदि नाच की धूम मची रहती है। परदेश गए हुए इस त्योहार पर घर लौट आते हैं। जो नहीं आते हैं उनकी बड़ी आतुरता से प्रतीक्षा की जाती है। आशा रहती है कि गणगौर की रात को जरूर आएँगे। झुंझलाहट, आह्लाद और आशा भरी प्रतीक्षा की मीठी पीड़ा को व्यक्त करने का साधन नारी के पास केवल उनके गीत हैं। ये गीत उनकी मानसिक दशा के बोलते चित्र हैं। फागुनी पूनम के दुसरे दिन से गणगौर तक गली गली में भोर उदय के साथ ही गणगौर के मधुर गीतों की गूँज कानो में गूंजने लगती हैं !रंग बिरंगी चुनरियों में सजी धजी सधवा स्त्रियों और कुंवारी कन्यायें थाल में कुमकुम गंध, अक्षत मेहँदी-काजल लेकर गणगौर को पूजने जाती हैंl यह पूजा 16 दिन तक चलती हैlजिस लडक़ी की शादी हो जाती है वो शादी के प्रथम वर्ष अपने पीहर जाकर गणगौर की पूजा करती है। इसी कारण इसे ’’सुहागपर्व’’ भी कहा जाता है। कहा जाता है कि चैत्र शुक्ला तृतीया को राजा हिमाचल की पुत्री गौरी का विवाह शंकर भगवान के साथ हुआ उसी की याद में यह त्यौहार मनाया जाता है। कामदेव मदन की पत्नी रति ने भगवान शंकर की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न कर लिया तथा उन्हीं के तीसरे नेत्र से भष्म हुए अपने पति को पुन: जीवन देने की प्रार्थना की। रति की प्रार्थना से प्रसन्न हो भगवान शिव ने कामदेव को पुन: जीवित कर दिया तथा विष्णुलोक जाने का वरदान दिया। उसी की स्मृति में प्रतिवर्ष गणगौर का उत्सव मनाया जाता है एवं विवाह के समस्त नेगचार होते हैं। पार्वती के अवतार के रूप में गणगौर माता व् भगवान् शंकर के रूप में ईशर जी की पूजा की जाती है !प्राचीन समय में पार्वती ने शंकर भगवान् को वर रूप में पाने के लिए व्रत और तपस्या की,शंकर भगवान् तपस्या से प्रसन्न हो गए और वरदान मांगने के लिए कहा, पार्वती ने वर रूप में उन्हें पाने की इच्छा जाहिर की, इस तरह पार्वती की मनोकामना पूरी हुई और दोनों विवाह बंधन में बंध गए, बस उसी दिन से कुंवारी कन्याएं मन इच्छित वर पाने के लिए और सुहागिने पति की लम्बी आयु के लिए ईशर और गणगौर की पूजा करती है
!'गण' का अर्थ है शिव और 'गौर' का अर्थ गौरी या पार्वती। स्पष्ट है कि गणगौर पर्व का संबंध शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना से है। कथा के अनुसार गौर अर्थात पार्वती का एक नाम रणुबाई भी है। रणुबाई का मायका मालवा और ससुराल राजस्थान में था। उनका मन मालवा में इतना रमता कि ससुराल रास नहीं आता था, पर विवाह के बाद उन्हें ससुराल जाना पड़ा। जब-जब भी वे मायके मालवा में आती थीं, मालवा की महिलाओं के लिए वे दिन एक उत्सव का माहौल रच देते थे। तभी से यह पर्व मनाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। राजस्थन की अनेक परम्पराऐ ंहैं, यह परम्परा किसी न किसी पौराणिक कथाओं से जुडी होती हैं। गणगौर उत्सव के पीछे कई लोक कथाऐं जुडी हैं। गणगौर का पर्व इस त्यौहार से सम्बंधित एक कथा इस प्रकार बतायी जाती है -जब स्वयंवर के लिए पार्वती जी के पिता द्धारा ब्रह्मा ,विष्णु आदि देवताओं के नाम प्रस्तावित किये गए तो पार्वती जी ने सभी देवताओं में कोई न कोई दोष निकाल कर अस्वीकार  कर दिया था ,जब वर के रूप में शिवजी का नाम आया तो पार्वतीजी ने सहर्ष उन्हें पतिरूप में स्वीकार कर लिया था! इसी तरह इसर और गौरी के दिव्य प्रेम के आदर्श को गणगौर के गीतों में तरह तरह से गाया जाता है l शिव और पार्वती के प्रेम को ही इस त्यौहार का आदर्श माना गया है l
 तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस में भी सीताजी द्धारा गौरी से राम को वररूप में पाने की प्रार्थना की गयी थी l इसी तरह कहा जाता है कि श्रीकृष्ण को वररूप पाने के लिए रुकमणी द्धारा भी गौरी की पूजा की गयी थी ,जिसके फलस्वरूप श्री कृष्ण द्धारा स्वयंवर से रुकमणी का अपहरण किया गया थाl
सबसे लोकप्रिय कथा के अनुसार एक गरीब परिवार की बेटी अपनी सहेलियों के साथ एक मेला देखने जाती हैं। बेटी के लिए उसकी माँ गुड, आटे तथा बेसन की पुडियाँ भेजती हैं। लडकी सहेलियों से बिछुड जाती हैं। तो अकेले बैठकर पूडियां खाती हैं। इतने में वहां से भगवान शिव तथा पार्वती निकलते हैं जो रूप बदलकर उसके पास आते है। दोनों उससे पूछते हैं कि यहाँ क्यों बैठी हैं। लडकी अपनी कहानी सुनाती हैं तो भगवान शिव उससे पूडियों का भोग स्वीकर करके कुछ आशीर्वाद मांगने को कहते हैं। तब लडकी उनसे मांगती हैं.... "जीणी-जीणी बान मांगू। महल को झरोखों मांगू, ढाल सही घोडो मांगू, ऊपर जीणी लाल को देवगढ की थाल मांगू, पगडी वालो वाटको, दो फुलका गेह का मांगू, ऊपर बचको भात को, घोडो चढतो वर मांगू और उंगली पकडयों वीर मांगूं।" ये सुनकर माता पार्वती ने उसे तथास्तु कहकर अंतर्ध्यान हो गए तथा उस लडकी की सारी गरीबी दूर हो गई तथा सब कुछ उसकी मांगों के अनुसार हो गया। ऐसे कई कथाऐं प्रचलित हैं।
राजस्थान प्रदेश मे गणगौर पर्व का सर्वाधिक महत्त्व है। पौराणिक आधार पर गण शिव और गौरी पार्वती की पूजा की परम्परा शताब्दियों से चली आ रही है। यह सर्वाधिक पावन-पर्व है। राजस्थान के सांस्कृतिक चेतना की पहचान इसी पर्व से बनी हुई है। सामन्ती परिवेश और राजाशाही जमाने में भी गणगौर पर्व को राजस्थान के विभिन्न शहरों में धूम-धाम से मनाया जाता रहा है।
इसे" गौरी तृतीया "भी कहते हैं । यज्ञ सागर पुस्तक में गणगौर पर्व, गणगौर संबंधी कथा, कहानियों, गौरी गीत, व्रत, उपवास आदी के बारे में विशेष जानकारी दी गई है।होलिका दहन की भस्म और किसी तालाब-सरोवर के जल से ईसर-गणगौर की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं तथा उन्हें वस्त्रालंकारों से सुसज्जित किया जाता है l पूजा के लिए हरी दूर्वा,पुष्प,और जल लाने के लिए महिलाएं प्रति दिन प्रात: सुमधुर गीत गाती हुई किसी उद्यान में जाती हैं तथा सजे हुए कलशों में जल भर कर लाती हैं तथा कुमकुम, मेहंदी, तथा काजल आदि सौभाग्य की प्रतीक वस्तुओं से ईसर-गणगौर की पूजा करती हैं l उसमे उल्लेख है कि चैत्र कृष्णा प्रतिपदा को कुवारीं कन्याऐं होलिका की विभूति से अखण्ड रूप मृनिश के पात्र में सोलह पिण्डिरा अपने हाथ से बनाकर भूमि पर षोडश दल कमल बनाकर उस पर मृनिश पात्र पाळसियां मे रखकर उसमें षोडश पिण्डिराओं, गौरी आदी मनाओं का पूजन शिव सहित चैत्र शुक्ला द्वितीया तक करके तृतीया व्रत यानी गौरी व्रत गणगौर उत्सव की सम्पन्न हेतु करती है। प्रलयाग्नि होलिका के सर्वभसम होने पर बचती है। विभूति इस अनोखी वस्तु को देखकर कहा जाता  है कि यह भगवान शिव की विशेष विभूति है। महादेव जी ने ब्रीज रूप से विभूति में स्थापित करके उडाया कि पार्वती अंग विषेश प्राप्ति भवेति उस विभूति के साथ बीज रूप का गणेश देवता रूप पार्वती माता ने बताया इसी प्रकार परम्बा रूप कुमारी कन्याऐं विभूति रूप से होलिका मृनिश से सोलह कलारूप गौरी ईश्वर रूप की स्वांगुलि आंगिन पिण्डिराऍं, शिव शक्ति रूपा मानी जाती है। मृनिश पाम गोल अण्डकराह रूप मानकर उसमें दीर्घायु पाने की कामना की जाती है। बीजारोपण अंकुरारोपणा कुमारी कन्याऐं तथा सुहागिन स्त्रियाँ सुख सौभाग्य एवं वंश वृद्धि के कामना से मृनिशमय गोल पथ में मृनिश रखकर उसमें तीन बार एक ही पात्र में तीन पुडन बीजारोपण किया जाता है।जल सिंचन करने चैत्र शुक्ला तृतीया को अंकुर समृद्ध शालिपात्र को गवरजा माता कि सम्मुख रखकर विधिवन् पूजन करके गवरजा माना रे मस्तिक तथा हाथों में उन समृद्ध अंकुर शाखाओं का समर्पण मानो शुभकामनाओं को हस्तगन करती हुई प्रार्थना करती है कि हे गौरी हमारा सुख सौभाग्य बढे तथा वंश कुल/बाडी में सदा आनन्द बढता रहे। अकुंर हरित हरा पीन पीला श्वेत इस समय का उपयोग वे सखियों के साथ हंसी ठिठोली करते हुए बिताती हैं ...शीतलाष्टमी के दिन काली मिट्टी लाकर उससे ईसर- गणगौर , मालन माली , आदि बनाये जाते हैं , उन्हें वस्त्र आदि पहनाते हैं , रेत अथवा काली मिट्टी की मेड़ बनाकर जंवारे ( जौ) उगाये जाते हैं ...सरकंडों पर गोटा लपेटकर झूला भी बनाया जाता है गणगौर पूजन करने वाली सभी स्त्रियाँ इकठ्ठा होकर ये सभी कार्य बड़े हर्षोल्लास से गीत गाते हुए करती है ...तत्पश्चात छोटे बच्चों (सिर्फ लड़कियों )को ईसर और गणगौर के प्रतीक रूप में दूल्हा -दुल्हन बनाकर उन्हें बगीचे में में ले जाकर खेल- खेल में गुड्डे गुड़ियों जैसी ही शादी रचाई जाती है पूजन करने वाली तथा दर्शक महिलाओं में से ही घराती और बाराती बनती है तथा आपस में ठिठोली करती हुई नृत्य गान आदि करती है ...आम लोकगीतों मे सुहागन महिलायें अपने अखंड सुहाग के लिए ईश्वर से प्रार्थना तो करती ही हैं , लगे हाथों विभिन्न आभूषणों और आकर्षक वस्त्रों की मांग भी कर लेती हैं.!.
शीतलाष्टमी के दिन पुरानी प्रतिमाओं के साथ सुसज्जित नई काष्ठ की प्रतिमाएं भी स्थापित की जाती हैं, शीतलाष्टमी के दिन प्रायः हर घर में बासी खाना ही खाया जाता है , इसलिए पूरा दिन महिलाएं घर के काम से मुक्त होती है ,गणगौर पूजा के लिए नवविवाहित युवतियां पीहर आती हैं । शायद इसीलिए गणगौर के गीतों में पीहर का प्रेम, माता -पिता के आँगन में बेटी का आल्हादित होना और अपने ससुराल एवं जीवन साथी की प्रीत से जुड़े सारे रंग भरे हैं । गणगौर पूजा में तो ये लोकगीत ही मन्त्रों की तरह गाये जाते हैं । पूजा के हर समय और हर परम्परा के लिए गीत बने हुए हैं, भावों की मिठास और मनुहार लिए ।
महिलाएं सज-संवर कर सुहाग चिन्हों को धारण किये हंसी ठिठोली करती हुईं पूजा के लिए एकत्रित होती हैं । पूजा के समय स्त्रियाँ एक खास तरह की चुनरी भी पहनती है ।
गणगौर पूजन के समय गए जाने वाला प्रमुख गीत इस प्रकार है --
"गौर गौर गोमती गणगौर पूज गनपति ,
ईसर पूजूं पार्वती ,पार्वती का आला गीला गौर का सोना का टीका ,टीका देरपांणि राणी बारात करे गौर दे पाणी !"
गणगौर एवँ स्वयँ के लिये श्रृँगार की माँग भी उनका अधिकार है -माथा ने मैमँद पैरो गणगौर, कानाँ नै कुण्डल पैरो गणगौर, जी म्हेँ पूजाँ गणगोर - ईसर्दासजी भी नखराळी गणगोर की माँगेँ पूरी करते हैँ - ईसरदासजी ज्याजो समन्दर पार जी, तो टीकी ल्याजो जडाव की जी - एक विशेष प्रकार की चूँदडी की भी माँग है -ईसरजी ढोला जयपुर ज्याजो जी, बठे सुँ ल्याय ज्योजी जाली री चूँदडी, मिजाजी ढोला हरा-हरा पल्ला हो, कसूमल होवै जाली री चूँदडी, स्वयँ के लिये भी-म्हारा माथा नै मैमँद ल्याओ बालम रसिया, म्हारी रखडी रतन जडओ रँग रसिया, म्हारी आँखडली फरूकै बेगा आवो रँग रसिया!
गणगौर का पर्व पति - पत्नी के अखंड प्यार का द्योतक है । इसके गीतोँ मेँ पति - पत्नी के बीच होने वाले मान - मनुहार का भी दर्शन है

इन गीतों में एक और जहाँ नारी -मन की व्यथा ,उमंगें भावनाएं और मादकता प्रकट होती है ,वहीँ दूसरी ओर इनके मद्धम से देवताओं को भी जनसाधारण की तरह व्यवहार करते हुए बताया गया है! 
सोलह दिन तक उल्लास और उमंग के साथ चलने वाला यह पारंपरिक पर्व सही मायने में स्त्रीत्व का उत्सव लगता है

गणगौर व्रत कैसे करें :-

गणगौर की पूजा मंगल कामना का पर्व है।राजस्थान के सांस्कृतिक चेतना की पहचान इसी पर्व से बनी हुई है। 

* चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी को प्रातः स्नान करके गीले वस्त्रों में ही रहकर घर के ही किसी पवित्र स्थान पर लकड़ी की बनी टोकरी में जवारे बोना चाहिए ।
* इस दिन से विसर्जन तक व्रती को एकासना (एक समय भोजन) रखना चाहिए ।
* इन जवारों को ही देवी गौरी और शिव या ईसर का रूप माना जाता है ।
* जब तक गौरीजी का विसर्जन नहीं हो जाता (करीब आठ दिन) तब तक प्रतिदिन दोनों समय गौरीजी की विधि-विधान से पूजा कर उन्हें भोग लगाना चाहिए ।
* गौरीजी की इस स्थापना पर सुहाग की वस्तुएँ जैसे काँच की चूड़ियाँ, सिंदूर, महावर, मेहँदी,टीका, बिंदी, कंघी, शीशा, काजल आदि चढ़ाई जाती हैं ।
* सुहाग की सामग्री को चंदन, अक्षत, धूप-दीप, नैवेद्यादि से विधिपूर्वक पूजन कर गौरी को अर्पण किया जाता है ।
* इसके पश्चात गौरीजी को भोग लगाया जाता है ।
* भोग के बाद गौरीजी की कथा कही जाती है ।
* कथा सुनने के बाद गौरीजी पर चढ़ाए हुए सिंदूर से विवाहित स्त्रियों को अपनी माँग भरनी चाहिए ।
* कुँआरी कन्याओं को चाहिए कि वे गौरीजी को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें ।
* चैत्र शुक्ल तृतीया (सिंजारे) को गौरीजी को किसी नदी, तालाब या सरोवर पर ले जाकर उन्हें स्नान कराएँ ।
* चैत्र शुक्ल तृतीया को भी गौरी-शिव को स्नान कराकर, उन्हें सुंदर वस्त्राभूषण पहनाकर डोल या पालने में बिठाएँ । इसी दिन शाम को गाजे-बाजे से नाचते-गाते हुए महिलाएँ और पुरुष भी एक समारोह या एक शोभायात्रा के रूप में गौरी-शिव को नदी, तालाब या सरोवर पर ले जाकर विसर्जित करें ।
* इसी दिन शाम को उपवास भी छोड़ा जाता है ।

गणगौर माता की  शोभायात्रा  :
 गणगौर माता की पूरे राजस्थान में जगह जगह सवारी निकाली जाती है जिस मे ईशर दास जीव गणगौर माता की आदम कद मूर्तीया होती है | उदयपुर की धींगा गणगौर, बीकानेर की चांद मल डढ्डा की गणगौर ,प्रसिद्ध है | ईश्वर गौरा की मूर्तियां को सजाकर उल्लासमय वातावरण में शोभा यात्रा निकाली जाती है। अंतत: किसी नदी, तालाब या पोखर में गणगौर को सम्मानपूर्वक विदाई दी जाती है। विदाई के दृश्य अत्यंत ही भावुक होता है। उदयपुर व जयपुर की गणगौर की सवारी को देखने के लिए हजारों लोग आते हैं। उदयपुर के तालाबों के बीच नावों में होने वाले नृत्य व गायन के आयोजन बड़े ही सुन्दर लगते हैं।
कर्नल टॉड ने उदयपुर की गणगौर की सवारी का बहुत ही रोचक वर्णन किया है। ""जहां अट्टालिकाओं में बैठकर सभी जातियों की स्रियां व बच्चे और पुरुष रंग-रंगीले कपड़े व आभूषणों से सुसज्जित होकर गणगौर की सवारी को देखते थे यह सवारी तोप के धमाके से वे नगाड़े की आवाज से राजप्रासाद से रवाना होकर पिछोला झील के गणगौर घाट तक बड़ी धूमधाम से पहुंचती थी व नौका विहार तथा आतिशबाजी प्रदर्शन के बाद समाप्त होती थी।''
जब गणगौर की सवारी निकाली जाती है तब जयपुर के गुलाबी राजमार्ग और भी खिल उठते हैं। राजस्थान की राजधानी जयपुर में गणगौर उत्सव दो दिन तक धूमधाम से मनाया जाता है। ईसर और गणगौर की प्रतिमाओं की शोभायात्रा राजमहलों से निकलती है इनके दर्शन करने देशी-विदेशी सैनानी उमड़ते हैं। सभी उत्साह से भाग लेते हैं। इस उत्सव पर एकत्रित भीड़ जिस श्रृद्धा एवं भक्ति के साथ धार्मिक अनुशासन में बंधी गणगौर की जय-जयकार करती हुई भारत की सांस्कृतिक परम्परा का निर्वाह करती है जिसे देख कर अन्य धर्मावलम्बी इस संस्कृति के प्रति श्रृद्धा भाव से ओतप्रोत हो जाते हैं। ढूंढाड़ की भांति ही मेवाड़, हाड़ौती, शेखावाटी सहित इस मरुधर प्रदेश के विशाल नगरों में ही नहीं बल्कि गांव-गांव में गणगौर पर्व मनाया जाता है एवं ईसर-गणगौर के गीतों से हर घर गुंजायमान रहता है।गणगौर का यह त्यौंहार राजस्थान की संस्कृति में रचा बसा है। शिव पार्वती के इस रूप की पूजा व अर्चना बीकानेर में महिलाओं के साथ पुरूषों के द्वारा भी भक्ति व श्रद्धा के साथ की जाती है। इस त्यौंहार में पुरूषों का इस तरह से जुडाव इस बात का प्रतीक है कि पुरातन समाज में स्त्री के साथ पुरूष भी हर त्यौंहार में उसका भागीदार रहा है।!
परम्पराओं के शहर बीकानेर में सैकडों वर्षों से यह परम्परा चली आ रही है और आज भी इस परम्परा का निर्वहन किया जाता है। और सच भी है कि त्यौंहार वह चाहे पुरूषों का है या महिलाओं का इसे श्रद्धा, भक्ति के साथ मनाकर देश, समाज की खुशहाली की कामना करने से भाईचारा ही बढता है। यह माना जाता है गणगौर अपने पीहर आती है और फिर पीछे पीछे गणगौर का पति ईसर उसे वापस लेने आता है और आखिर मे चैत्र शुक्ल द्वितीया व तृतीया को गणगौर को अपने ससुराल वापस रवाना कर दिया जाता है और इन्हीं दिनों में जब गणगौर अपने पीहर होती है, गणगौर को खुश करने के लिए गणगौर के सामने गीत गाए जाते है और माता से कामना की जाती है वह देश, शहर, परिवार व कुल की समृद्धि करे उसकी रक्षा करे। पुरूषों द्वारा भी इन गीतों में माँ गवरजा से यही कामना की जाती ह। साथ ही साथ इन गीतों में वीर रस के गीत भी गाए जाते हैं और ईसर द्वारा यह दर्शाया जाता है कि वह गणगौर के लिए योग्य वर है और वह गणगौर को प्राप्त करने की कामना रखता है। इसी तरह गीतों में यह भी दर्शाया जाता है कि गणगौर ईसर को ताने मारती है और कहती है कि अगर तूने मेरी तरफ देखा तो तुझे मेरी बहन दातुन में, मेरा भाई खाने में जहर दे देंगे लेकिन ईसर नहीं मानते और आखिर वह अपनी गणगौर को अपने साथ लेकर ही जाते है। गणगौर की बहनों की तरफ से यह भी गीत गाया जाता है कि अब ईसर जी आप आ तो गए ही हो और गणगौर को लेकर ही जाआगे तो कुछ दिनों के लिए तो इसे छोड दो ताकि यह जब तक यहॉ है हमारे साथ रह सके। यह भक्ति, श्रृंगार व वीर रस के सारे गीत चौक में पाटों पर पुरूषों द्वारा गाए जाते है।हमें आवश्यकता है आज इस भक्तिमय, श्रृद्धापूर्ण एवं लोक कल्याण हेतु संस्थापित लोकोत्सव को संज्ञान वातावरण में मनाये जाने की परम्परा को अक्षुण बनाये रखने की। इसका दायित्व है उन सभी सांस्कृतिक परम्परा के प्रेमियों एवं पोषकों पर जिनका इससे लगाव है और जो सिर्फ पर्यटक व्यवसाय की दृष्टि से न देखकर भारत के सांस्कृतिक विकास की दृष्टि से देखने के हिमायती हैं।
राजस्थानी में कहावत भी है तीज तींवारा बावड़ी ले डूबी गणगौर | अर्थ है की सावन की तीज से त्योहारों का आगमन शुरू हो जाता है और गणगौर के विसर्जन के साथ ही त्योहारों पर चार महीने का विराम आ जाता है |गणगौर के बाद बसन्त ऋतु की बिदाई व ग्रीष्म ऋृतु की शुरुआत होती है।
डॉ सरस्वती माथुर
4A4C577B-6D00-4FDB-8C3F-E32B7ACE1EA1