शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

होली व रंग पर रचनाएं

होली पर हाइकु
1.
दही होलिका
मन की बुराइयाँ
संग में जली ।
2.
फाग आया तो
मन हुआ पलाशी
तन भी रँगा ।
3.
वाह री होली
फागुनी बयार में
भंग है घोली ?
4.
रंग उड़े तो
फाग चिड़िया बोली
करो ठिठोली।
5
तन ने सोखी
फागुनी पिचकारियां
दहका मन।
6
मन रंग के
फागुनी हवाओं ने
डफ़ बजाया।
7
होली के रंग
रंगरेज बन कर
मन को रंगे।
8
होली उमंग
सैंया बजाये चंग
पी कर भंग।
9
मन आँगन
फगुनौटे मौसम
रोप दिये हैं।
10
मन के राग
फागुनी हवाओं संग
गा रहे फाग ।
डाँ सरस्वती माथुर 



नवगीत : "यादों के पाहुन !"
"केसरिया मन- करो न फागुन !"
कहाँ छिपी हैं
पछुवा हवाएं
रंग- गौरैया- फुलवारी


याद आ रहीं हैं बस
फूलों की लदी क्यारी
ढफ -ढोल की फगुनाहट
कहाँ खो गयी हुरियारी
सूनी -सूनी लगती क्यूँ है-अब 
होली की हुरंगी किलकारी


जाने कब झर गयीं
आमों की मंज़रिया
नहीं गूंजते फाग गीत
खोयीं गांवों की गुजरिया
लगते फीके टेसू के रंग- न
 दिखती सतरंगी फुलकारी

***

फिर करों न फागुन तुम

मन को केसरिया- डाल
गुलाल और रंगों की झारी !

डॉ सरस्वती माथुर
"रंग !"
रंग
हाँ वो ही रंग जो
सुमनों पर उडती
तितलियाँ पी लेती हैं
बासंती फागुन की
अगुवाई में
रंग
हाँ वो ही रंग जो
ढाई आख़र  के
प्रेम में दहक कर
गुलमाेहर से दमकते हैं
अमराई में
रंग
हाँ वो ही रंग जो



गुलाल -अबीर से
उड मन अँगना को


उन्मादित कर देते हैं


पुरवाई में
रंग
हाँ वो ही रंग जो 
कोयल की किलकार सुन
टेसू से खिल जाते  हैं
मन रंगरेज सा रंग जाते हैं
तन्हाई में ।
डाँ सरस्वती माथुर 

 होली का त्यौहार आ गया

डॉ सरस्वती माथुर

  फागुनी बौछार लेकर
 भौरों का अभिसार लेकर
 मन में उल्लास जगा गया 
 रसभरा त्यौहार आ गया

 केसर चन्दन टेसू  रंगों में
 मुस्कराता मधुमास छा गया
 चंग और फाग-राग  गाता

 होली का त्यौहार आ गया
 केसरिया पिचकारी लेकर  
 कुमकुम गुलाल अबीर की
 उल्लसित फुहार बरसा कर
 मौसम पर पलाश छा गया
 होली का त्यौहार आ गया
 रसिया गाता  हवाओं संग  
 कलियों में तरुणाई जगा
 जाफरानी अमराई महका

 "होली का त्यौहार !"
हरी- हरी वसुंधरा है रंगों भरा आकाश
होली का दिन आया लाया सबको पास


भूल जाएँ मन के भेद दूर करें अभिमान
मन संग बाँध लें रामायण और कुरआन



होली के जलधार से प्रेम का हो विस्तार
अहम् भूला कर सारे मन में भर लो प्यार


रसपगे रंगों से भरा है होली का त्यौहार
तन भिगोये मन बांधे इसके जल की धार


कृष्ण राधा संग खेल रहे रंग और गुलाल
देख प्रेम रूप कृष्ण का राधा हुई निहाल l
डॉ सरस्वती माथुर
2
"बौराई होली !"
फूल फूल डाल डाल पे

पुरवाई होली

पीत अंगरिया मन रक्तिम

बौराई होली

सरस राग रंग डफ मंजीरे



फिर गाई होली

मारी पिचकारी कपोल गात पे

फगुवाई होली

भांग ठिठोली बेसुध बोली

पगलाई होली

गुजिया- ठंडाई ,केसर -चन्दन से

महकाई होली

प्रेम- प्रीत, गीत गोविन्द संग

मनाई होली

राधा रानी ने श्याम रंगरेज से

रंगवाई होली !


डॉ सरस्वती माथुर होली का त्यौहार आ गया !डॉ सरस्वती माथुर 

1

मौसम टेसू

 मन हुआ फागुन

 होली के संग

2

 महकी हवा

रसपगी होली सी

बिखरे रंग l

3

होली के रंग


उमंग नवरंग

भंग के संग l

4

  भीगते मन

 फगुनाया मौसम

  होली के रंग l

5

  भीगी सी होली  

  फागुनी बयार में

  रसपगी सी l

6   

पीत पराग

आँगन में गुलाल


 होली तो होली l

7

रंग गुलाल

अक्षत चन्दन में

 भीगे से तन l

      8

भीगा सा तन 

अबीर गुलाल से

  हरषे मन l

      9

फागुनी रंग

चंग मृदंग भंग


आगई होलीl

      10

 भंग के संग  

 फागुन का मौसम

  होली के चंग l

 डॉ सरस्वती माथुर

ए -2 , सिविल लाइंस

जयपुर-६



महुवाया फाग मनाया होगा!"

तुम्हारे मन के
आँगन में भी
उतरा होगा फागुन



मीठी तकरार के साथ
पिया ने की होगी ठिठोली
तुमने भी खेली होगी
हुरंगो के संग होली


टेसू रंग भी चटके होंगे
चंग थाप भी थिरके होंगे
तब मुस्कान तुम्हारे
अधरों पर लहराई होगी
तब सतरंगा इन्द्रधनुष
उग आया होगा

सच बताना फगुनाया सपना
जब  पलकों पे उतर आया होगा
मौसम की सुधियों संग तब
बीती यादों के
गुलदस्ते भी महके होंगे
खुमार भी छाया होगा

तब चुपके से तुमने वोही
पुराना फाग गीत
दोहराया होगा 

भीगा होगा तुम्हारे
जीवन का  सुरमई  मौसम
उनके रंगों में डूब
महुवाया फाग
 मनाया होगा

रंग गुलाल से
भीगा होगा तुम्हारे
जीवन का मौसम
गहरे प्यार में सरोबार हो
 सरसराया होगा



तब तुम्हारे
मन के आँगन में
फागुन उतर आया होगा !
डॉ सरस्वती माथुर
"आज की होली!"
फाग बदला राग बदला
चंग भंग का हुरंग बदला



गुलाल की खुशबू बदली
डफ का मधुर ताल बदला
टेसू की महक बदली
प्रीत का आसंग बदला



राधा कृष्ण का रास बदला
पिचकारी का आकार बदला
चन्दन तो सफ़ेद लाल रहा पर
सुगंध का रस्मो रिवाज बदला
पकवान-गुझिया का स्वाद बदला



होली मिलन की रस्म भी बदली
इन्टरनेट का जाल भी बदला
मोबाईल से रस्मे  बधाई देने का 
नया रूप बदला नया हाल बदला
फैशन बदला पर्वों का मिजाज़ बदला



फाग के रसीले गीतों के फ्यूज़न में
डी जे का शोर करता सुर ताल बदला
डॉ सरस्वती माथुर
लघु कवितायें

"फागुन की बेला है!"
1
होली है आई
शीतल मधुमय सी
प्रेम रंग संजोये
तन रंग लो
फागुन की बेला है
मन  भी रंग लो
2
गुलाल रंग
फाग चंग के संग
बौराया सा था मन
पंख खोल के
फागुनी चिड़िया से
गूंजा घर आँगन l
3
कान्हा का रास रचे
राधा की प्रीत जले
डारत रंग
नैनों की बोली में
श्याम खेले होली में
4
खेल रहे हैं होली
नन्द जी के लाल
उड़े गुलाल
चंग पे मची धमाल
मारत पिचकारी
 राधा को गोपाल
डॉ सरस्वती माथुर
ए-2 सिविल लाइंस
 जयपुर-6

"होली का त्यौहार आ गया !"



  फागुनी बौछार लेकर
 भौरों का अभिसार लेकर
 मन में उल्लास जगा गया 
 रसभरा त्यौहार आ गया
 केसर चन्दन टेसू  रंगों में
 मुस्कराता मधुमास छा गया
 चंग और फाग-राग  गाता
 होली का त्यौहार आ गया
 केसरिया पिचकारी लेकर  
 कुमकुम गुलाल अबीर की
 उल्लसित फुहार बरसा कर
 मौसम पर पलाश छा गया
 होली का त्यौहार आ गया
 रसिया गाता  हवाओं संग  
 कलियों में तरुणाई जगा
 जाफरानी अमराई महका
 होली का त्यौहार आ गया !
......................................
होली आई- होली आई
 दहके फूल पलाश के
 महके रंग गुलाल के
 सरसों ने ली अंगड़ाई
 होली आई होली आई
 फागुन का देख जोश
 धरती डूबी मस्ती में
 मौसम  में मादकता  छाई
  होली आई होली आई 
  डाल डाल टेसू खिले  
     चैत की गुहार पर
  चेहरों   पर उल्लास मिले
    होली आई होली आई 
  हवा के पंख पर केसर उड़े
  लेकर फगुआ का सन्देश
   कूकी कोयलिया वन वन
     होली आई होली आई  
   मुखरित हो अब  छेड़ो राग
   ढाई आखर प्रेम के रहें
      द्वेष बचे न शेष
   होली का उल्लास गूंजे
    भीगी  बौराई पुरवाई
   होली आई होली आई l
डॉ सरस्वती माथुर
           ..................
          .....................
 आई.... . होली..... आई
.....  .हायकु
...................
 धूप पंखुरी
खिली फागुन बन
  बजे मृदंग
......................
  मौसम टेसू
 मन हुआ फागुन
  होली के संग
..........................
   महकी हवा
रसपगी होली सी
   बिखरे रंग
......................
होली के रंग
उमंग नवरंग
भंग के संग 
..................... 
फागुनी मौसम .
फागुनी मनुहार पर
गुन्जन करते भंवरे डोले
 फूलों को रिझाते बोले 
 जाड़े की केंचुल उतार
 करें धरा का रूप श्रृंगार
 नये बौर महकाएं मिलकर
 पाहुन के पैरों में  महावर रच
 प्रीत अंग अंग में भर दें
 नये कांधों पर बसंत को लादें
  अभिसारी गीतों से फागुनी
  मौसम भीना भीना कर दें !
डॉ सरस्वती माथुर 
ए--२ सिविल लाइन
 जयपुर-6 

 
     
 लघु कवितायें 

  "होली के रंग !" 
1
रंग चूँदडी
फागुन का मौसम
उडता फिरे
लेकर के राग रंग
अनुरागी सा मन
2
रंग उड़े तो
बोली फाग चिड़िया
आई है होली
भरके मधु मिठास
लो करो न ठिठोली
3
सतरंग में
मौसम लाया फाग
छनती भंग
होली की तरंगों में
फागुन के संग मेंl
4
रंग बयार
फागुनी ये त्यौहार
भीगा तन भी
प्रीत पीत पराग
अँगना में गुलाल
5
फगुआ मन
पाहुन बन डोला
मिटा कटुता
मौसम से यूँ बोला
स्वागत फागुन का l
6
जमुना तीरे
सुन बाँसुरी राधा
हुई अधीर
भीगती गयी वो तो
प्रेम के रस रंग l
7
रंग गुलाल
बिखरा धरा पर
झूमी गोपियाँ
डाल के श्याम रंग
फागुन हुआ मन
8
बैरंग मन
अबीर गुलाल में
भीग गया तो
फागुनी पुरवा में
हुआ अधीर मन
9
मृदंग बाजे
ओढ़ चूंदडी लाल
राधा का मन
गया होली में रंग
श्याम सखा के संग
10
धरा ने ओढ़ी
सतरंगी चूनर
होली के रंग
चहुँ ओर मृदंग
मन में भी उमंग l
11
धरा रंगोली
तरंगमयी होली
रंग बहार
पीत पराग लाया है
बासंती त्यौहार
12
रंग बयार
फागुनी ये त्यौहार
भीगा तन भी
प्रीत पीत पराग
अँगना में गुलाल
13
रसरंग से
धरती है बसंती
छुईमुई सी
फागुनी बयार में
समेट लाई प्यार
14
द्धार द्धार पे
फागुनी बयार है
संग रंगों के
अबीर गुलाल है
रंगीला त्यौहार है l
15
टेसू के फूल
चंग मृदंग संग
फागुनी रंग
चंग भंग ठंडाई
होली की टोली आई l
16
रस रंग ले
फागुन मुस्कराया
अमराई में
नेह फुहार लाया
रसरंगा त्यौहार l
डॉ सरस्वती माथुर
ए -2 ,सिविल लाइंस ,जयपुर -6 
46FC678C-90EC-4DFC-ADC7-2F739BDBB985

डॉ सरस्वती माथुर
डॉ सरस्वती माथुर

लघुकथा :
"  मान सम्मान का नया रसरंग !"
पिछले एक हफ्ते से मोना बुजुर्गों का मान सम्मान विषय पर हो रहे एक सेमीनार में अपने शहर आई हुई हैl अपने शहर यानि अपना मायका, जहाँ जीवन के २५ वर्ष उसने गुजारे थेl हमेशा इस शहर में आने के मौके वो तलाशती रहती है !इस बार माँ के गुजरने के बाद पहली बार आई है l खुशबू की तरह हर कोने में माँ की यादें बसी हैं , वैसे भी होली आने के दस दिन पहले से ही मोना के मायके में सफाई का अभियान शुरू हो जाता था l पुरानी किताबें, अखबार और खाली डिब्बों का आँगन में अम्बार लग जाता था !उसके बाद पकवान गुजियाँ का दौर शुरू होता था lकांजी डाली जाती थी ! नवीन उत्साह से घर में रंग रोगन के बाद रंगोली बनाई जाती थीl पिताजी की तस्वीर पर नयी माला चढती थी l पिताजी एक जाने माने लेखक थे ,माँ बड़ा गर्व करती थी l पिताजी की एक एक किताब को वो छाड़ कर वापस पुस्तकालय में जमा कर धूप बत्ती दिखा देती थी l मोना को याद है माँ हमेशा कहती थी, इन किताबों को मैं लायब्रेरी में भी दान नहीं दे सकती क्यूंकि मुझे लगता है तेरे पिता इनमे आज भी जिन्दा हैं, गाहे बगाहे इन किताबों से बाहर आकर ,घर भर में घूमते रहते हैं l मोना का दिल भर आया था l
आज भी घर में सफाई अभियान चल रहा था l घर का पुराना नौकर रामू तहखाने से बोरा भर कर लाया औरआँगन में उलट दिया ! मोना ने देखा माँ की संगृहीत पुस्तकें ,गीता ,रामायण और भी बहुत सी धार्मिक किताबों के साथ पिता जी की लिखी किताबों का ढेर भी वहां उलट दिया था , रद्दी वाला उन्हें तौलने को तैयार था l भाईवहां आराम कुर्सी पर बैठे थे l उनके आदेश पर रामू रद्दी ला रहा था l तभी रसोई घर में से धोती से हाथ पोंछती भाभी आँगन में आयीं और कुछ देर मौन खड़ी उन किताबों को देखती रहीं !फिर भैया से बोलीं -"आप इन्हें निकाल रहे हैं?"
"हाँ शांता ,क्या करेंगे, देखो सब पर दीमक लग गये हैं l" भैया ने एक किताब पर बने दीमक के घर को दिखाया !
भाभी ने तपाक से जवाब दिया -" जी नहीं यह रद्दी नहीं है l यह मेरी सास और ससुर की जमा पूँजी है lअपने जीते जी मैं इन्हें नहीं बेचने दूंगी !" मैं अम्मा की तरह ही हर साल इन्हें सहेजऊँगी!" वह प्रणाम की मुद्रा में झुकी और पिताजी की लिखी किताब को माथे से लगा बोलीं -"रामू सबको झाड कर वापस पुस्कालय में ज़माना है ,चल वापस बाँध !"
तभी बाहर चंग डफ के साथ फाग के गीतों से लिपटी बयार ने घर आँगन में मान सम्मान का नया रसरंग घोल दिया था ,यूं लगा माँ पिताजी होली का आशीर्वाद देने हवा की पालकी पर बैठ कर आए हैं !मोना ने कृतज्ञता से भाभी की ओर देखा!  उनकी आँखें नम थीl भैया अवाक् से उन्हें देख रहे थे ! रद्दी वाले की तराजू अभी भी हवा में लटकी थी !
डॉ सरस्वती माथुर
 संपर्क :ए -२ ,सिविल लाइन
शिक्षाविद एवम सोशल एक्टिविस्ट
साहित्य :देश की साहित्यिक पत्रिकाओं में कवितायेँ ,कहानियां ,आलेख एवम नये नारी सरोकारों पर प्रकाशन
प्रकाशन ४ कृतियाँ प्रकाशित
संपर्क :ए -२ ,सिविल लाइन
जयपुर विगत कई वर्षों से निरंतर लेखन। कविता, कहानी, पत्रकारिता, समीक्षा, फ़ीचर लेखन के साथ-साथ समाज साहित्य एवं संस्कृति पर देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन।  
विशेष:  जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल 2013 में कवितानामा सेशन में भागीदारी के अंतर्गत कविताओं की प्रस्तुति
शिक्षा व सामाजिक सरोकारों में योगदान, साहित्यिक गोष्ठियों व सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी, विभिन्न साहित्यिक एवं शिक्षा संस्थाओं से संबद्ध, ऑथर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया, पब्लिक रिलेशंस सोसाइटी ऑफ़ इंडिया( राजस्थान चैप्टर की सदस्य।...)
ए -2,
सिविल लाइन्स
जयपुर -6
Dr Saraswati Mathur
A-2 Civil Lines, Jaipur-6 
 "बिखरा गुलाल!"

बिखरे रंग
चंग मृदंग से गूंजा
रंगीला आकाश


होली की
खुली अर्गला
खुले कई संबोधन
बिखरा गुलाल
शब्दों में फूटा
इन्द्रधनुषी विश्वास


बौराया मौसम
घुटी जो भंग
पंख खोल उड़े
आशाओं के रंग
फागुन की चिड़िया ने
भर दिया उल्लास


द्वेष छोड़ कर
 आगये पराये भी
होली में पास
डॉ सरस्वती माथुर
"फागुनी मौसम में!"
टेसू फूलों पे
 जब रसवंती फागुन
चिड़िया सा चह्कता है       
तब मन के फीके रंग
 हवाओं के संग मिल
 सतरंगी हो जाते हैं

 जाने क्यों तब फागुन की
 हर भोर में- चिड़ियाँ के
 कंठों से निकला
 एक एक स्वर
मैं लपक लेती हूँ और
पाती हूँ कि
 सच में मेरी जिंदगी
फूल सी खिल उठी है

मैं सोचने भी लगती हूँ कि
 धरती भी तो
फागुनी रंगों सी
 अलग अलग रंग दिखाती है
 हमें जीना सिखाती है
 तभी शायद मैं हर शाम
थके लाल सूर्य के गोलों को
तपते देखती हूँ और
 हैरान होती हूँ  कि
उसके श्रम से टपकी सिन्दूरी बूंदे
 सागर में घुलते ही जाने कैसे
जीवन की लय बन जाती है
 मन में समां गुनगुनाती है

 तब गाहे बगाहे  सोचती हूँ कि
 किस तरह समय का
 मौसमी सूरज
पृथ्वी की हथेलियों पर
 मेहँदी की तरह रंग छोडता है
 जीवन के आकाशी
 पहियों पर दौड़ता है

 तब मैं भी उत्साह से भर 
 धरा से रंग बटोर के 
कविता की फुलकारी
 बुनने  लगती हूँ,

 भावनाओं की कलम को
 रंगों की स्याही में डूबो      
 फागुनी मौसम में
 आशा के इन्द्रधनुषी
 गीत गुनने लगती हूँ !
डॉ सरस्वती माथुर
चोका
"होली आई तो !"
मन महका
रंगों की छटा छाई
होली आई तो
धरा भी फगुनाई
फागुन चुन्नी
पुरवा संग उडी
सभी को भाई
मृदंग चंग बजे
फाग गुंजाई
रंगों के भंवरों की
गुंजार भाई
ढोल मंजीरे बजे
फागुन ऋतु आई
डॉ सरस्वती माथुर

"मन महका!"
रंग बयार
धरा पर बरसी
मन खुमारी
अंगड़ाई ले सरसी
छोड़ नींद को
उडी तितली बन
डाल डाल पे
विविधवर्णी फूल
खिले उन्मत
बिखरे फाग रंग
जगी सुगंध
पी के रंग गुलाल
रंगीन तन
रिश्तों की मिठास में
घुले थे रंग
प्यार की ठिठोली से
महके होली रंग
डॉ सरस्वती माथुर 
 होलिया के हुरंग .. होली है आई.... ..बिखरे रंग
सुरंगी होली
1
प्रेम छंद के
पिरो करके गीत
घर आँगन गूंजा
मधुर राग
सज़ धज के आया
प्रिय देखो न फाग l
2
सपनो भरी
रंगों की दुनिया है
गूंजे होली के राग
प्रेम के संग
आओ भी प्रियतम
खेलें हम भी फाग

 3
महके टेसू
केसरिया पलाश
फागुनी प्रीत संग
गूंजें हैं हास
मधुरम रागिनी
है मधुरंग फाग
4
 होली है आई
शीतल मधुमय सी
प्रेम रंग संजोये
तन रंग लो
फागुन की बेला है
मन को भी रंग लो
5
दुतारी चंग
झांझ मंजीरा बाजे
अबीर गुलाल से
महके रंग
झरोखे अटारी पे
हवा में गूँजे मृदंग
6
सुरंगी होली
मधुमास में डोली
बिखरे रंग
डफली बाजे
फगुआ गुलाल में
होलिया के हुरंग
7
भोर ने खेली
इन्द्रधनुषी होली
सूर्य फैंके गुलाल
नभ ने रंगा
खोल के मुट्ठी डाला
करा धरा को लाल
8
पिचकारी में
फागुनी आहट ले
आई ऋतु सुहानी
मन के राग
नवरंग बजाते
गा रहे सब फाग
10
बिखरे रंग
फागुनी संबोधन
आशाओं के गुलाल
भीगा सा मन
इन्द्रधनुषी फाग
चंग भंग मृदंग !
डॉ सरस्वती माथुर

"आज की होली!"
फाग बदला
 राग बदला
चंग भंग का
 हुरंग बदला

गुलाल की
 खुशबू बदली
डफ का
 मधुर ताल बदला
टेसू की
 महक बदली
प्रीत का
आसंग बदला

राधा कृष्ण का
 रास बदला
पिचकारी का
आकार बदला
चन्दन तो
सफ़ेद लाल रहा पर
सुगंध का
 रस्मो रिवाज बदला
पकवान-गुझिया का
स्वाद बदला l
 होली मिलन की
 रस्म भी बदली
इन्टरनेट का
 जाल भी बदला
मोबाईल से
 रस्मे  बधाई देने का
नया रूप बदला
 नया हाल बदला
फैशन बदला
 पर्वों का मिजाज़ बदला
 फाग के रसीले
गीतों के फ्यूज़न में
डी जे का शोर करता
 सुर ताल बदला
डॉ सरस्वती माथुर 
 1 होलिया के हुरंग .. होली है आई.... ..बिखरे रंग
सुरंगी होली
1
प्रेम छंद के
पिरो करके गीत
घर आँगन गूंजा
मधुर राग
सज़ धज के आया
प्रिय देखो न फाग l
2
सपनो भरी
रंगों की दुनिया है
गूंजे होली के राग
प्रेम के संग
आओ भी प्रियतम
खेलें हम भी फाग

 3
महके टेसू
केसरिया पलाश
फागुनी प्रीत संग
गूंजें हैं हास
मधुरम रागिनी
है मधुरंग फाग
4
 होली है आई
शीतल मधुमय सी
प्रेम रंग संजोये
तन रंग लो
फागुन की बेला है
मन को भी रंग लो
5
दुतारी चंग
झांझ मंजीरा बाजे
अबीर गुलाल से
महके रंग
झरोखे अटारी पे
हवा में गूँजे मृदंग
6
सुरंगी होली
मधुमास में डोली
बिखरे रंग
डफली बाजे
फगुआ गुलाल में
होलिया के हुरंग
7
भोर ने खेली
इन्द्रधनुषी होली
सूर्य फैंके गुलाल
नभ ने रंगा
खोल के मुट्ठी डाला
करा धरा को लाल
8
पिचकारी में
फागुनी आहट ले
आई ऋतु सुहानी
मन के राग
नवरंग बजाते
गा रहे सब फाग
10
बिखरे रंग
फागुनी संबोधन
आशाओं के गुलाल
भीगा सा मन
इन्द्रधनुषी फाग
चंग भंग मृदंग !
डॉ सरस्वती माथुर

"आज की होली!"
फाग बदला
 राग बदला
चंग भंग का
 हुरंग बदला

गुलाल की
 खुशबू बदली
डफ का
 मधुर ताल बदला
टेसू की
 महक बदली
प्रीत का
आसंग बदला

राधा कृष्ण का
 रास बदला
पिचकारी का
आकार बदला
चन्दन तो
सफ़ेद लाल रहा पर
सुगंध का
 रस्मो रिवाज बदला
पकवान-गुझिया का
स्वाद बदला l
 होली मिलन की
 रस्म भी बदली
इन्टरनेट का
 जाल भी बदला
मोबाईल से
 रस्मे  बधाई देने का
नया रूप बदला
 नया हाल बदला
फैशन बदला
 पर्वों का मिजाज़ बदला
 फाग के रसीले
गीतों के फ्यूज़न में
डी जे का शोर करता
 सुर ताल बदला
डॉ सरस्वती माथुर 
 

1
"रंग भरी शाम!"

पुरवाई मन
महका जीवन
कहीं नहीं विराम
रंग भरी शाम

सपनों को थाम
पलाश से हुअे
फागुनी पैग़ाम
रंग भरी शाम

संदली भोर में
सतरंगी धूप पी
भरी नयी उड़ान
रंग भरी शाम

अमराई मन
उड़ता फिरा
बाँच तुम्हारा नाम
रंग भरी शाम

बासंती मौसम
बुने नये सुर
भर यादों के जाम
रंग भरी शाम।
डाँ सरस्वती माथुर
***
2
"एक गीत मैं भी लिख डालूँ !"

सप्तरंगी डोर से
सूरज को बासंती
धूप को भोर से
चांद को चकोर से
मिला एक कर डालूँ
एक गीत मैं भी लिख डालूँ

हवाओं से सुर  माँग
चौकपुरे आँगन में
मिला फागुनी भांग
देहरी पर तामवर्ण
तोरण लगा लूँ
एक गीत मैं भी लिख डालूँ

जागती यादों का
धूपछांही रशिमयों से
अनुरागी वादों का
बाँध सप्तरंग
प्रेम के रंग बुन डालूँ
एक गीत मैं भी लिख डालूँ

आम की अमोरी से
महुआ-कचनार की
गंधभरी मयूरी से
नेह रीत का
रंग भरी प्रीत का
एक गीत मैं भी लिख डालूँ !
***
"यादों की आरी!"

हवा की देहरी
मौसम के साथ
फागुनी बोरी
बासंती रंगों में
घुल मिल बतियाती
यादों की आरी चल जाती

नीम की निबोली
गंध फागुन में घुल
कोयल की बोली
तीर सी चुभती
मन भारी कर जाती
यादों की आरी चल जाती

नभ की गली
चांद चांदनी की
प्रीत जब पली
चकोरी को खल जाती
आंसूओं से अंजुरी भर जाती
यादों की आरी चल जाती ।

डाँ सरस्वती माथुर
ए-२
सिविल लाइन
जयपुर...6

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"रंग के संग !"
1.
तुमने रंग चुराये
डूबते सूरज के
तो मैं साँझ हो
आकुल सी
सागर किनारे
रात में जज़्ब हो गई ।
2.
मैं शाम के
उदास रंग हूँ
दिन भर की
बेला से बटोर कर
जिन्हें जमा किये
और सागर में
डूबो दिये।
3.
सूर्योदय में
सतरंगी चिडिया
रंगों को निहारती है
बासंती हो
फागुनी हवाएँ भी
फूलों से रंग बटोर
तितली सी मँडराती हैं
मकरंद पी कलियों को
चटकाती हैं
धूप की उजास पी
भँवरों से मिलाती हैं
प्रेम में रंग जाती हैं !
4
रंगों की
पहन पाग
घूमता है
रंगीला फाग
फूलों के रंग चुरा
मौसम संग
मन रंग जाता है
तन भी रंग जाता है।
5.
गुलाबी रंग
रोम रोम झूमता

5
फागुन संग मौसम में
उत्सव हरित धरा पर
दस्तरख़ान बिछाता है
बासंती हवाओं से
वसुंधरा सजाता है
रंग अनंग हो जाता है।
डाँ सरस्वती माथुर

"रंग संग चंग!"
रंग रंग फागुन
हुई हवाएँ सुगना
मन में उठी हिलोरें
नैनों में जागा सपना

गौरी की कलाई पर
सज गया कंगना

ठौर  ठौर फागुन
उत्सव की रचना
अनछुई सिहरन
गुलाल का झरना

रंगों भरी पुरवाई
अल्पना सजी अँगना

पौर  पौर थिरकन
 पंचरंगी कल्पना
शोर मचा चंग का
याद आ गये सजना।
डाँ सरस्वती माथुर

"रंग भरी शाम!"

पुरवाई मन
महका जीवन
कहीं नहीं विराम
रंग भरी शाम

सपनों को थाम
पलाश से हुअे
फागुनी पैग़ाम
रंग भरी शाम

संदली भोर में
सतरंगी धूप पी
भरी नयी उड़ान
रंग भरी शाम

अमराई मन
उड़ता फिरा
बाँच तुम्हारा नाम
रंग भरी शाम

बासंती मौसम
बुने नये सुर
भर यादों के जाम
रंग भरी शाम।
डाँ सरस्वती माथुर
***
"एक गीत मैं भी लिख डालूँ !"

सप्तरंगी डोर से
सूरज को बासंती
धूप को भोर से
चांद को चकोर से
मिला एक कर डालूँ
एक गीत मैं भी लिख डालूँ

हवाओं से सुर  माँग
चौकपुरे आँगन में
मिला फागुनी भांग
देहरी पर तामवर्ण
तोरण लगा लूँ
एक गीत मैं भी लिख डालूँ

जागती यादों का
धूपछांही रशिमयों से
अनुरागी वादों का
बाँध सप्तरंग
प्रेम के रंग बुन डालूँ
एक गीत मैं भी लिख डालूँ

आम की अमोरी से
महुआ-कचनार की
गंधभरी मयूरी से
नेह रीत का
रंग भरी प्रीत का
एक गीत मैं भी लिख डालूँ !
डाँ सरस्वती माथुर
जी कुछ और रचनाएँ लिख कर पोस्ट करती हूँ

"खो गये हैं रंग !"

 कच्चे पड गए रिश्ते

खो गए हैं रंग

महंगी जीवन किश्ते

थक गया है शायद

रंगों का रंगरेज

न साझा चूल्हा

न ढोल डफली

न आँगन में झूला

बस बाट  जोहती है

सूनी सी सेज

न पायल की रुनझुन

न संवाद में व्याकरण

न रंगों की रस धुन

न त्यौहार में आचरण

न उत्साह में तेज ।
डॉ सरस्वती माथुर
...........................
"रंग फागुन का !"

सलोनी सुबह थी
रंगों के बादल थे
 भर मुट्ठी उड़ाया

जीवन के नभ पर
चांदनी थी बर्फ
धरा की किताब में
बंद थे चंद हर्फ़
फाग गूंजा तो
मन मुस्कराया

मन तरुओं पर
ठूँठो की भाषा थी
पर नए पात आयेंगे
यह एक आशा थी
हवा की लहरों पर
इन्द्रधनुष बनाया

रंग फागुन ले आया
नया राग सुनाया
सप्तरंगी रंग छाया

डॉ सरस्वती माथुर
जी कुछ और रचनाएँ लिख कर पोस्ट करती हूँ

"खो गये हैं रंग !"

 कच्चे पड गए रिश्ते

खो गए हैं रंग

महंगी जीवन किश्ते

थक गया है शायद

रंगों का रंगरेज

न साझा चूल्हा

न ढोल डफली

न आँगन में झूला

बस बाट  जोहती है

सूनी सी सेज

न पायल की रुनझुन

न संवाद में व्याकरण

न रंगों की रस धुन

न त्यौहार में आचरण

न उत्साह में तेज ।
डॉ सरस्वती माथुर
...........................
"रंग फागुन का !"

सलोनी सुबह थी
रंगों के बादल थे
 भर मुट्ठी उड़ाया

जीवन के नभ पर
चांदनी थी बर्फ
धरा की किताब में
बंद थे चंद हर्फ़
फाग गूंजा तो
मन मुस्कराया

मन तरुओं पर
ठूँठो की भाषा थी
पर नए पात आयेंगे
यह एक आशा थी
हवा की लहरों पर
इन्द्रधनुष बनाया

रंग फागुन ले आया
नया राग सुनाया
सप्तरंगी रंग छाया
डॉ सरस्वती माथुर
जी कुछ और रचनाएँ लिख कर पोस्ट करती हूँ

"खो गये हैं रंग !"

 कच्चे पड गए रिश्ते

खो गए हैं रंग

महंगी जीवन किश्ते

थक गया है शायद

रंगों का रंगरेज

न साझा चूल्हा

न ढोल डफली

न आँगन में झूला

बस बाट  जोहती है

सूनी सी सेज

न पायल की रुनझुन

न संवाद में व्याकरण

न रंगों की रस धुन

न त्यौहार में आचरण

न उत्साह में तेज ।
डॉ सरस्वती माथुर
...........................
"रंग फागुन का !"

सलोनी सुबह थी
रंगों के बादल थे
 भर मुट्ठी उड़ाया

जीवन के नभ पर
चांदनी थी बर्फ
धरा की किताब में
बंद थे चंद हर्फ़
फाग गूंजा तो
मन मुस्कराया

मन तरुओं पर
ठूँठो की भाषा थी
पर नए पात आयेंगे
यह एक आशा थी
हवा की लहरों पर
इन्द्रधनुष बनाया

रंग फागुन ले आया
नया राग सुनाया
सप्तरंगी रंग छाया

डॉ सरस्वती माथुर
विशेषांक ....रंग !"...डॉ सरस्वती माथुर
"होली जब आती है !"

होली औपचारिकता नहीं
 हमारी परंपरा है
जब हम खेलते हैं
होली के रंग
मिठास घुलती है
आत्मीयता खिलती है

 गुलाल मलते हैं तो
 मन के आँगन में
 चंग  मृदंग बजते ही
 नेह रस बरसाती
 एक चिड़िया उड़ती है

 होली जब आती है
 मेलजोल का
 माहौल बनाती है
ढ़ोल डफ के साथ
 फागुनी बयार बहकर
दिलों को मिलाती है l
डॉ सरस्वती माथुर
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गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

 स्नेही  भैया 
हाइफन पत्रिका के लिये अपने इाइकु भेज रही हूँ ।
सस्नेह
डाँ सरस्वती माथुर
image.jpeg
डाँ सरस्वती माथुर
हाइकु
1.
मैं हूँ रचना
संगृहीत करके
कोश बना लो।
2.
सफर रूका
पर मन की गाड़ी
चलती रही।
3
दहक उठा
चाँद का अलाव तो
चाँदनी जली।
4.
बैरागी हवा
पहाड़ों पे जा कर
मौन साधती।
5.
अथाह प्यास
एक बूँद पाकर
सिंधु लगती।
6.
धुँध का झारा
चाँद सूरज पर
किसने मारा?
7.
कच्चे पक्के से
ख़्वाबों को बुन कर
सोई थी आँखें ।
8.
कोरा है मन
प्रेम अक्षर लिख
रंग भर लो।
9.
सूखा सा मन
प्रीत की हाला पीके
रसीला हुआ।
10
नभ का चाँद
पहाड़ों की चोटी पे
दीये सा जला।
11:
बेबाक़ शब्द
शवो जैसे होते हैं
उन्हें जला दो।
12
बर्फ़ की लगी
सर्द बंदनवार
ठिठुरी रात।
13.
लहरें उठी
बदरंग कर गई
रेत के नीड़।
14.
साधक मेघ
नभ पहाड़ी पर
जोगी सा बैठा।
15.
डूबता सूर्य
परिंदे सा दुबका
सिंधु नीड़ में ।
16.
सर्द मुट्ठी में
क़ैद था जो कोहरा
धूप में दौड़ा ।
17.
सरकंडो में
कुआंरी चाँदनी को
चाँद छेड़ता।
18.
सूखता मन
यादों के छींटों से
हरा सा हुआ।
19.
लम्हे पकड
गुज़रते वक़्त का
चित्र सजाया ।
20.
सिगडी दिन
सुलग सुलग के
बुझ ही गया।
डाँ सरस्वती माथुर
ए-2
सिविल लाइन
जयपुर - 6
परिचय :
नाम : डॉ सरस्वती माथुर
शिक्षाविद एवम सोशल एक्टिविस्ट ,कवियत्री-लेखिका - साहित्यकार व हाइकुकार
साहित्य देश की साहित्यिक पत्रिकाओं में कवितायेँ ,कहानियां ,आलेख एवम नये नारी सरोकारों पर प्रकाशन
प्रकाशन ४ कृतियाँ प्रकाशित व साझा संकलन में कवितायें , कहानियाँ, लघु कथाएँ व हाइकु संकलित
काव्य संग्रह : प्रयास
1॰एक यात्रा के बाद
2.मेरी अभिव्यक्तियाँ
3.एक पुस्तक जैव प्रोधोगिकी पर प्रकाशित । िविभिन्न
जयपुर विगत कई वर्षों से निरंतर लेखन। कविता, कहानी, पत्रकारिता, समीक्षा, फ़ीचर लेखन के साथ-साथ समाज साहित्य एवं संस्कृति पर देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन।
शिक्षा व सामाजिक सरोकारों में योगदान, साहित्यिक गोष्ठियों व सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी, आकाशवाणी दूरदर्शन व विभिन्न साहित्यिक एवं शिक्षा संस्थाओं से संबद्ध, ऑथर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया, पब्लिक रिलेशन काउंसिल आफ इंडिया वुमन विंग की पूर्व अध्यक्षा, पब्लिक रिलेशंस सोसाइटी ऑफ़ इंडिया (राजस्थान चैप्टर की चार्टर
सदस्या ),गिल्ड आफ विमन एचिवर (राजस्थान चैप्टर )से संबद्ध।
जयपुर लिटरेरी फ़ैस्टिवल में कवितानामा में भागीदारी।
विदेश यात्रा के दौरान अमेरिका,कनाडा,ब्रिटेन के विभिन्न शहरों की संस्कृति को देखने समझने का अवसर मिला ।
संपर्क
:ए -२ ,सिविल लाइन
जयपुर -6
0141-2229621
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गुरुवार, 7 जनवरी 2016

लघुकथाएं


***डॉ सरस्वती माथुर की 10 लघुकथाएँ***

  
 डॉ सरस्वती माथुर
लघुकथाएँ
1.
श्रम का बीज
उस दिन सर्दी बहुत थी l धूप में भी तेजी नहीं थी, धुंध का पर्दा हवा में रह -रह कर काँप उठता था lअलसाई सी    ठंडी भोर  में किसका मन होता है बाहर निकलने का, पर भंवरी  को तो जाना ही होगा lभंवरी उठ खड़ी हुई ,उसने बोरी उठाई और कचरा बिनने चल दी lरोज का यही नियम था lकचरे से बटोरी हर चीज़ वह अपने बोरे में तरतीब से सहेज लेती  lबच्चों के उठने से पहले ही घर लौट आती l उसके बच्चे उससे कभी नहीं पूछते थे  कि वह कहाँ काम करती है iउसने उन्हे बस इतना बता रखा था कि वह एक सेठानी के यहाँ  मालिश करने जाती है और उसे महीने के चार पाँच हज़ार रुपये मिल जाते हैं और  पति की चार  हज़ार के लगभग   पेंशन मिल जाती है तो गुजारा हो जाता है ,भंवरी के पति बीमा कंपनी के एक सरकारी दफ्तर  में चपड़ासी थे , अचानक उनकी मृत्यु हो गयी थी तो उसके बाद से मजबूरन  भंवरी को कचरे बटोर कर बेचने का  काम करना पड़ा l
भंवरी अनपढ़ थी उसे कहीं काम नहीं मिल रहा था  तो उसे सेंट्रल पार्क के माली ने यह सुझाव दिया ,तब से वो इसमें जुट गयी lअब वह बूढ़ी हो गयी है और इस काम में अभ्यस्त भी lउसकी मेहनत का ही फल था की दो  बेटे  इंजिनियरिंग में पढ़ने  चले गए l  भंवरी  के पास  उसकी जमा पूंजी थी ,कुछ बच्चों की तकदीर कि उन्हे कालेज में  स्कॉलरर्शिप मिल गयी l
बेटी बड़ी थी, उसने बी॰ एड॰ करके एक स्कूल में नौकरी कर ली और एक सहयोगी अध्यापिका के कहने पर आई॰ ए॰ एस का इम्तिहान दे डाला और चयनित हो गयी l झुग्गी झौंपड़े से क्वार्टर और वहाँ से सरकारी बंगले में पहुँच गयी l
*समय का जादूगर क्या- क्या करतब दिखाता है, आज एक संस्था द्वारा भंवरी की  बेटी का सम्मान समारोह
 था lझुग्गी झौंपड़ी में पली बढ़ी एक लड़की ने जीवन संघर्ष  की जमीन देखने के बाद  इतना बड़ा ओहदा पाया था ,भंवरी कैसे अपनी आँखों से ना देखती l वह भी बेटी के साथ चमचमाती कार में कोटा डोरिया की नीली साड़ी पहन कर गर्व से पहुंची थी ,सम्मान से प्रथम कतार में भंवरी को  बिठाया गया था l फूल मालाओं से लदी बेटी ने माइक संभाला और जनता को संबोधित किया --"मान्यवर , बहुत बहुत आभार मुझे सम्मान देने के लिए लेकिन इस सम्मान की सही में हकदार मैं नहीं कोई और है ,आज मैं  दो शब्द उन्ही बारे में कहने को खड़ी हुई हूँ  यह  हाल में  बिलकुल मेरे सामने की सीट पर पहली कतार में   नीली साड़ी में जो महिला बैठी है ,वो मेरी माँ है...भंवरी देवी नाम है इनका , दरअसल यह इनका ही आशीर्वाद है कि आज मैं यहाँ आपके समक्ष खड़ी हूँ l हमे पालने के लिए  मुंह अंधेरे हमारी  माँ उठ कर कचरा बिनने जाती थीं, उसे कबाड़ी को बेच कर उससे जो पैसा मिलता था , उससे हमारा पेट भरती थीं l हाँ ,  इन्होने हमसे  झूठ  बोला कि यह सेठानी के घर मालिश करने जाती हैं ,लेकिन यह झूठ हमारे लिए एक चिराग की  रोशनी की तरह था





जो बार बार हमें  अहसास कराता था कि हमें जीवन संघर्ष में सच की ओर जाना है और कुछ कर दिखाना  है l मेरी माँ उस कचरे में से जो छोटी  छोटी पेंसिलें  एकत्रित करके लाती थी ,उनसे मैंने लिखना सीखा l
 आज मैं आप सबको बतलाना चाहती हूँ कि बड़े बड़े महलों व घरों में रहने वाले लोग सच के बोरे में झूठ  भरते रहते हैं ,पर मेरी माँ रोज कचरे की बोरी में मेरे लिए एक नयी चुनौती भर के लाती थी l
मैं चाहूंगी कि मेरी माँ भंवरी देवी को मंच पर बुलाया जाये ताकि मैं उनके चरण स्पर्श करके सबके सामने गर्व से यह कह सकूँ कि कचरा बीनने वाली मेरी माँ सही अर्थों में एक कर्मवीर  महिला है जिन्होने अपने जीवन के हसीन खवाबों को अपने बच्चों की  आँखों में देखा है l
माँ आज मैं एक बेटी होने के नाते से आपसे भी एक वादा करना  चाहूंगी कि मैं जीवन भर आपके श्रम के बीज़ को सींच कर आने वाली बेटियों के लिए एक नयी दुनिया रचूँगी ,हर शनिवार ,इतवार को झुग्गी झौंपड़ियों में जाकर नि:शुल्क बेटियों को पढाऊँगी ,उन्हे पत्थर  से तराश कर हीरा बनाऊँगी l"
हाल  तालियों से गूंज रहा था ,भंवरी देवी को सम्मान से मंच पर लाया गया ,तालियों की गड़गड़ाहट के बीच  भंवरी देवी ने  नज़रें उठा कर देखा कि सब खड़े हैं l
वह हक्की बक्की सी मंच पर खड़ी सोच रही है पर मैंने ऐसा क्या किया ? हाँ एक हीरे सी बेटी जरूर पैदा की
 है lआँखें मूँदे वह देर तक हाथ जोड़े मंच पर  खड़ी रही!

2
सपना एक नामी गिरामी फाइव स्टार होटल के पिछवाड़े का  दृश्य है यह !
राम लखन बर्तन माँजते  हुए  टपकते पानी की आवाज़  सुन रहा था पर  उसके कान पास खड़े दो नौजवानो की बातों पर भी लगे थे जो आई॰ आई॰ टी के परिणामों की चर्चा  कर रहे थे !


लाल कमीज़ वाला छात्र कह रहा था --"यार मैंने शहर के  बेस्ट कोचिंग सेंटर में दाखिला लिया पर फिर भी सफल नहीं हो पाया !"
काली शर्ट वाला बोला ---"क्या करें यार ,मैं भी पास नहीं हो पाया ,सुना है जो प्रथम आया है वो अपने शहर का ही है ,तू

जानता है उसे ?
"नहीं, पर सुना है कि एक होटल में अपने पिता जी के साथ बैरे का काम करता है !" लाल शर्ट वाले ने मुंह बना कर कहा
"यार ऐसे कैसे सलेक्ट हो जाते हैं लोग ?" काली शर्ट वाले ने थोड़ा तैश में स्वर खींचा
लाल शर्ट वाले ने सिगरेट सुलगाई और एक कश खींच कर अपने दोस्त को दिया !दोनों वहाँ से आगे बढ़ गये !बर्तन माँजते हुए रामलखन अपने काम में मगन रहते हुए अपने आप से  कह रहा था ---"हाँ  भाई मैं प्रथम आया हूँ  क्योंकि मेरे पिता की मेहनत और माँ का सपना था कि मैं भी आई॰ आई॰ टी की  परीक्षा पास करूँ ,सो मैंने कर ली !अब बस उनका सपना साकार करना है !नल बंद कर के राम लखन आत्मविश्वास से बर्तन उठा होटल के किचन की  तरफ बढ़ गया !
 3
तुलसी का बिरवा ! 

रामबहादुर जी ने एक एजेंट के माध्यम से अपना पुश्तैनी मकान बेच कर अपने बेटों के पास अमेरिका जाने का निश्चय किया था तो  आस पास के सभी लोगों को घर की चीज़ें बाँट गए थे  ! अपने देश से दूर जाना उनकी मजबूरी थी क्यूंकी दोनों बेटे वहाँ जा बसे थे ! इस घर से उन्हे बहुत लगाव था पर क्या करते ,कैसे उसकी देखभाल करते विदेश से बार- बार आना  संभव नहीं  था ! उनके इस पुश्तैनी घर  के अहाते में उन्होने बहुत से फलों के पेड़ और फूलों के पौधे लगा रखे थे, दूर दूर से लोग उनका यह बगीचा देखने आते थे ! हमेशा घर आँगन फूलों की महक से भरा रहता था ! उस घर के एक कोने में एक तुलसी  का सुंदर बिरवा भी था ! इस राम ओर श्याम तुलसी को उनकी  दादीजी ने  बरसों पहले रोप

था और उसकी शाखाएँ इतनी फ़ैल  गईं थीं  कि जब उस पर तुलसी मंजरी के दल लटकते थे तो   डालें झुक सी  जाती थी ! बड़ी धूमधाम से हर वर्ष कार्तिक माह में उनकी दादी  तुलसी शालिग्राम का ब्याह  रचा कर  सारी बिरादरी को खीर पूड़ी खिलाती थीं ! वो दिन आज भी राम बहादुर जी को याद आते हैं ! दादी के बाद उनकी माँ ने भी उस परंपरा का पूरा सम्मान रखा और खुशकिस्मती से पत्नी भी उन्हे ऐसे ही संस्कारों वाली मिलीं थीं  जो परंपरा ओर आधुनिकता  की कड़ी थी! नौकरी भी करती थी  और सभी परम्पराओं को वैज्ञानिक मान  कर बदस्तूर निभाती  भी थीं !  विशेष तौर पर इस तुलसी के बिरवे  को तो वो नियम से सींचती थीं, साँझ को दिया जलाना तो वो कभी नहीं भूलीं ! कार्तिक में भी वह  भी  तुलसी ब्याह की परंपरा निभाती थीl    अंतर बस  इतना भर था  कि  वह वक्त के अभाव में पूरी बिरादरी नहीं  न्योत पातीं थीं ,बस  करीबी सगे संबंधियों के साथ पूज लेतीं थीं  !घर बेचने के बाद  काफी सालों तक राम बहादुरजी का देश में आना नहीं हुआ !  अमेरिका में  उन्हे हर पल अपना देश ,शहर ,पुश्तैनी घर , दोस्त व अपने परिवार वाले बहुत याद आते थे l वह मौका ढूंढ  ही रहे थे कि उन्हे अपने साले की लड़की की शादी का निमंत्रण-पत्र  मिला ,उनकी खुशी का ठिकाना न रहा! बहुत उत्साह से उन्होने अमेरिका से सभी नाते रिश्तेदारों के लिए ख़रीदारी करी और भारत के लिए सपरिवार चल दिये!  सबसे मिले जुले ,अनुभव भी सुखद रहा !  

"देखते ही देखते वक्त प्रवासी चिड़िया सा फुर्र हो गया ! जाने का समय नजदीक आ गया ! समय कम रह गया  था ,एक दिन उन्होने हिचकते हुए अपने बड़े बेटे से  अपने मन की ख्वाईश कह दी ... “श्रीकांत,  तू कहे तो  हम जयपुर जा आयें ,  रिश्तेदारों और दोस्तों से भी मिल आएंगे ,कुछ पुरानी यादें ताजा कर आएंगे ,फ्लाइट से दिल्ली से बीस मिनट ही तो  दूर है  जयपुर,  क्या कहता है "  बेटा मुस्कराया और उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए उनके जाने का इंतजाम भी 

कर दिया l   कुछ रिश्तेदार वहाँ थे , दोस्त थे, सबसे मिल कर दोनों पति पत्नी आनंद से भर उठे !  लेकिन यहाँ आने के बाद शहर में अपने पुश्तैनी घर को एक नज़र देखने का लोभ भी संवरण नहीं कर पा रहे थे रामबहादुर जी  ! एक शाम पत्नी के साथ पहुँच ही गए  ! उन्होने देखा कि घर पूरी तरह से नयी शक्ल ले चुका था पर जमीन तो वही थी ...आसपास की खुशबू भी वैसी ही थी, हाँ संदर्भ, परिवेश ओर कुछ लोग अलबत्ता बदल गए थे l राम बहादुर जी कुछ पल घर के बाहर नि:शब्द खड़े रहे, फिर  डरते डरते घर का द्वार खटखटाया  ! द्वार खुला तो देखा  सामने  युगल दंपति खड़े थे ,रामबहादुर जी  ने अपना  परिचय दिया और अपनी भावनाये बताई तो बड़े सम्मान से युगल दंपति ने  मुस्कराते हुए खुले दिल से  उनका स्वागत कियाl युगल दंपति की बुजुर्ग अम्मा व  ,नन्हें बच्चे भी उनके इर्द गिर्द आ खड़े हुए थे! यूं   बिलकुल नहीं लग रहा था कि सब  पहली बार मिल रहें हैं ! खूब ढेरों बातें हुई ,चाय पानी  के बाद  वह उठने ही वाले थे कि उनकी अम्मा ने कहा -- " रुको बेटा, साँझ हो गयी है, मैं तुलसी बिरवे पर दिया बाल  कर अभी आई और हाँ  तुम अच्छे अवसर पर आए हो ,आज घर में शालिग्राम जी  की   पूजा  रखी थी ,उसका प्रसाद भी लेते जाना !  रामबहादुर जी ने भावाकुल हो  अपनी पत्नी की  ओर  देखा  तो पाया  उसकी आँखें नम थी , रामबहादुर जी की पत्नी  तभी कह उठीं -"अम्मा जी , तुलसी बिरवा है अभी....क्या हमारा  बुजुर्गों का रोपा हुआ ... ?"

"हाँ  बिटिया है न हमारे बाग में, हाँ  अहाते  में  तो जरूर कुछ   नए कमरे बन गए हैं अब , पर यह तुलसी मैया तो इतनी  फैलीं हुईं थी कि इनकी जड़ें कैसे काटते  हम , मैंने न हटाने दिया तुलसी मैया को, ... आर्र्कीटेक्ट भैया  ने   अहाते में ही एक छोटा सा गार्डेन बना  दिया तो हमने  आपके द्वारा लगाई इस पावन  धरोहर को सहेज  लिया, अरे  आओ न  तुम  भी  दर्शन करो और  बहू आई ही  हो तो अपने हाथ से तुलसी बिरवे पर दीपक भी तुम्ही बाल दो !"

 रामबहादुर जी  और उनकी पत्नी  नि:शब्द भावविभोर  तुलसी बिरवे के पास खड़े थेl दिया ज्योतित हो चुका था ! उन्हे उसकी लौ में अपने बुजुर्ग दिखने का सा आभास हो रहा था  ... दूर से  आ रही मंदिर की घंटियाँ की आवाज़ कानो में रस घोल रही थी! हवा के ठंडे झोंकों में बगिया से  मोगरे गुलाब की  खुशबू  वातावरण को महका रही थी lदोनों  भाव विभोर

  अभी भी तुलसी मैया के आगे हाथ जोड़े खड़े थे ! सच में  उनका भारत आना सफल हो गया था और मन फूल सा  हल्का था  !  राम बहादुर जी मन  ही मन  सोच रहे थे कि चाहे  हम कितने ही आधुनिक हो जाएँ पर यदि अपनी विरासत में मिली परम्पराओं  को हम दिल में सहेज लेंते हैं तो सारा परिवेश रसमय और पवित्र हो जाता है, जो आज के पर्यावरण के लिए जरूरी भी है !  पर्यावरण शुद्ध होगा तो प्रकृति भी  हमेशा महकेगी और जीवन में चिड़ियों की चहक सी खुशियाँ भी हमेशा बनी रहेगी ! 

4

गांधीजी के तीन  बंदर !

मुरली बाबू आज मुंह अंधेरे पार्क में घूमने चले गए थे ,पार्क सुनसान था ,बस एक कुत्ता कछुए की तरह अपने पाँव समेटे एक बैंच के नीचे सो रहा था ,एक लंबा चक्कर लगा कर  वह भी कुछ देर एक बैंच पर सुस्ताने  बैठ गये ,तभी पार्क के बीचों बीच लगे गांधी जी के तीन बंदरों पर उनकी निगाह गई ,अरे ये क्या तीनों बंदरों के हाव भाव  कौन बदल गया ,उन्होने चश्मा नाक पर ठीक करके पास जाकर देखा तीनों बंदरों के नीचे लगी  एक पट्टी पर मुद्रा को संदर्भित करता कथन भी लिखा  हुआ था, अरसे से यूँ  ही  बैठे तीनों   बंदरों की मुद्राएँ कुछ यूँ  थी -पहला बंदर -अंधा हूँ पर आजकल ऑपरेशन करा लिया है,बस रात में देखता हूँ और भृष्टाचार  से मिले नोट गिनता हूँ !

दूसरा बंदर -समय बदल गया है तो मैं क्यूँ न बदलूँ?कम  बोलता हूँ , नेता हूं! संसद में विपक्ष पर छींटे कस मन हल्का कर लेता हूँ !

तीसरा बंदर -बिलकुल समय बदला है ,तकनीकी  भी बदली है , सुन रहा हूँ कि  गाहे बगाहे  एक दूसरे के  कैसे कान काटे जाते हैं, यह सब अब कान की मशीन लगा कर  सुनता  भी हूँ ,    एक दिन संसद में गया तो देखा कि अरे यहाँ तो शब्दों 

का पूरा ज्ञानकोश है और अब जरूरत क्या है कानो पर हाथ रखने की ?मुरली बाबू ने  ध्यान से बंदर के बदले हाव भाव देखे ,मुद्राएँ कुछ यूँ थीं -पहले बंदर की आँखों पर काला चश्मा था lदूसरे बंदर का मुंह खुला  हुआ था ।तीसरे बंदर के दोनों कानो में हियरिंग ऐड  लगी थीl तभी उन्हें उनकी बीबी ने  गहरी नींद से  जगाया -""अजी सुनते हो सैर पर नहीं जाना क्या ? चौंक कर मुरली बाबू जागे  -"अरी भाग्यवान थोड़ी देर तो सोने देती, सपना देख रहा था, सच बंसी की अम्मा गज़ब का सपना था ...समय बदला तो गांधी जी के तीनों बंदरों की  मुद्राएँ  भी बदली दिखीं !

5

 आ री कनेरी चिड़िया!

मीठी मात्र आठ साल की थी जब घर के अहाते के एकदम बाहर बरवाड़ा हाउस सोसाइटी ने  पीले कनेर के 10 पेड़ रोपे थे  !अभी भी याद है गायत्री देवी को जब गर्मियों में गरम हवाओं के झोंके तन को गरम कर देते थे तो कनेर की नूकीली पंखियाँ चँवर सी झूल कर मौसम को खुशनुमा बना देती थी !शुरू शुरू के वो दिन गायत्री देवी की यादों में आज भी ताजा है lबरवाड़ा सोसायटी का यह अहाता तब बच्चों   के क्रिकेट का मैदान था ,गर्मी की लू से बेपरवाह रहते हुए दिन भर धमाचौकड़ी होती थी! वहाँ खेल कूद करते बच्चे कनेर के इस पेड़ के नीचे बैठ कर थकान मिटाते थे ,इसके पीले पीले फूल जब डाल  से छूट कर बच्चों के उपर आ गिरते थे तो मौसम में बसंत छा जाता था l उन फूलों को एक दूसरे पर उछाल कर सभी मिल कर एक स्वर में गाते थे ----"आ री कनेरी चिड़िया ...गा री कनेरी चिड़िया ....शिवजी के मंदिर में फूलों को जाकर चढ़ा री कनेरी चिड़िया .....आ री कनेरी चिड़िया ...!" यह किसी प्रदेश का लोकगीत था जो भोलू ने अपनी दादी से सीखा था और सब की जबान पर चढ़ गया था !गायत्री देवी जब तक बरवाड़ा हाउस के इस अहाते में रहीं ,पूजा में कनेर के फूलों को नियमित चढाती रहीं lफिर वह अपने छोटे बेटे के पास विदेश चली गईं lबड़ा बेटा अभी भी बरवाड़ा हाउस ही में रहता है ,वे आती जाती रहती हैं !इस बार का आना विशेष मायने  रखता है ,वह मीठी की शादी में पूरे परिवार के साथ शामिल होने आई हैं !मीठी जो उनकी लाड़ली पोती है ,कानून की पढ़ाई खत्म करके अब प्रैक्टिस कर रहीं हैं ! 
चोबीस वर्ष की हो चुकी हैं मीठी !गायत्री देवी इस बार भारत लगभग पाँच वर्ष बाद आईं हैं ! इस बार विशेष रूप से यहाँ की संरचना में उन्हे बड़ा बदलाव लगा, वह हैरान भी थीं और दुखी भी कि गगनचुंबी इमारतें बनाने के चक्कर में बरवाड़ा हाउस ही नहीं पूरे शहर की काया पलट के फलस्वरूप यहाँ की सुंदरता भी तहस नहस हो गयी हैl कल की सी बात लगती है जब अहाते के आस पास का सौंदर्य अप्रतिम था ...वह कैसे भूल सकतीं हैं कि भोर होते ही यहाँ चिड़ियाएं नए नए राग छेड कर सभी को जगाती थी  और अब देखो तो जगह जगह से डालें काट दी गईं हैं ...कनेर जो हर रंग में अपनी आभा बिखेर के मन मोह लेते थे उदास खड़े हैं ,कनेर जो मंदिर का दर्शन थे ,जो हवाओं की आहटों के साथ थिरकते थे ,मौन खड़े हैं, कनेर जो मंदिर का दर्शन हैं ,विष पीते हुए मंदिरों में अमृत बरसाते हैं ,शिव जी पर चढाये जाते हैं ,वहाँ की  रचना का दर्शन हैं  ...वहाँ की अभिव्यक्तियों का जीवन मकरंद हैं ...जो हवाओं की दस्तकों के साथ घण्टियों की तरह बजते से लगते हैं, सद्भाव आस्था का भाव जगाते हैं ,आज चीख चीख कर कह रहें हैं कि हमे न काटो, हमें बचाओ ,हम तो इन आहतों की देहरी के रखवाले हैं, प्रहरी हैं ,पर्यावरण के रक्षक हैं lगायत्री देवी उन्हे बड़े दार्शनिक मनोभाव से एकटक जब निहार रहीं थीं तो मीठी उनके पास आ खड़ी हुईं ---"प्रणाम दादी, आपका जेट लेग पूरा हुआ या नहीं ?"-"अरी कहाँ बिटिया, देख न नींद ही उड गयी है मेरी तो, देख न मीठी कितनी बेदर्दी से नोचा है इन कनेर की डालियों को , बांसुरी सी लहराती थी कभी ,जगह जगह से काट दी गयी हैं ....चिड़ियों का बसेरा तक नहीं दिख रहा Iगायत्री देवी की आवाज़ में भी दर्द था जिसे मीठी ने भी महसूस किया!
"अरे दादी जान सोसाइटी वालों ने तो इसे काटने के आदेश तक दे दिये थे वो तो मैंने सभी सदस्योंI के हस्ताक्षर लेकर नोटिस देकर इन्हे रोका है  स्पष्ट निर्देश निकलवाये  हैं कि इन्हे न काटा जाये बल्कि इमारत जो बन रही है उसकी बनावट में इन पेड़ों की परिधि छोडी  जाये।इन ओरर्ननामेंटल पेड़ो की सीमा रेखा छोड़ते हुए ही नक्शा पास करवाया जाये,स्टे ले लिया है, केस चल रहा है अभीl"
गायत्री देवी ने स्नेह से मीठी की आँखों में देखा,सोचा सच कितनी समझदार होगयी है मीठी... यह बच्ची ,पर्यावरण  का संरक्षण  ही नहीं कर रही   है बल्कि  हरियाली जो प्रकृति का अनुपम शृंगार होती उसे भी बचाने के जीवट संघर्ष मेँ जुटी है

 ...तभी तेज हवा का झोंका आया तो साथ में हवाओं की बौछार के साथ पीले कनेर के बहुत से फूल गायत्री देवी के इर्द गिर्द बिखर कर वातावरण को मनमोहक सुगंध से भर गये, तन के साथ साथ मन को भी सुवासित कर गये! देर तक गायत्री देवी के कानो में गूँजते रहे यह मधुर स्वर....".आ री कनेरी चिड़िया ...गा री कनेरी  चिड़िया........!

6

हरियाये बाँस का आमंत्रण
विनायक एयरपोर्ट से सीधे टैक्सी  लेकर अपने गाँव पहुँचा तो हैरान रह गया! मनफूल काकी  आज भी अपनी कुटिया को बाँस की बातियों से छवा रही थी l उन्ही की बगल में घीसू काका  सा ॰  बांस की खप्पचियों से कच्ची झोंपड़ी की दीवारों को मूँज की रसियों से बांध रहे थे lविनायक  ने इतनी सुंदर कारीगरी पहले कभी नहीं देखी थीl करीब तीस साल बाद वो अपने गाँव आया था l उसके ताऊ रूप लाल सा॰ जी का देहावसान हो गया था इसलिए आना भी जरूरी था l टैक्सी जैसे ही  दालान में रूकी वहां कंचे खेल रहे घर के छोटे  बच्चे खुशी से उसके इर्द गिर्द घूमर करने लगेl दरअसल यह गाँव नहीं था बल्कि  एक दूरस्थ बसी कच्ची ढ़ाणी थीl बरसों पहले विनायक के पिता नौकरी की तलाश में  यहाँ से एक व्यापारी सेठ के साथ शहर चले गए थे, कभी कभार ही आते थे l फिर  सेठ की कंपनी के  साथ  अमरीका जाना पड़ा फ़िर वहीं बस गए !विनायक तब छोटा  ही था पर जेहन में इस ढ़ाणी की धुंधली सी यादें जरूर थी l वो हरियाये बांस के झुरमुट में दोस्तों के साथ छुपन छुपाई खेला करता था ,उसे याद आ रहा था कि उन दिनों उनकी  दादीसा .बांस की तकली से सूत कातती थी lगांवों में खुले आम ढ़ोर ढंकर घूमा करते थे ,उन्हे तालाबों में नहलाने  लेके जाया जाता था lवो दृश्य भी विनायक कों याद था जब दादा सा॰  रंग बिरंगे कागजों को बांस की खप्पचियों पर चिपका कर पतंग बनाते   थे । दादा सा बच्चों की फटी पतंगों पर भी  आटे की लेई से जगह जगह कागज के पेबन्द  चिपका  कर दालान में बांस की   चटाई  पर सुखाते भी थे lतभी विनायक की  तंद्रा टूटी जब उसे  देख कर मनफूल काकी सा॰ने हाथों की छत्तरी बना कर 
पहचाना और गदगदाई आवाज़ में  स्वागत करते हुए बोली --"अररे वीनू बचुवा. आई गवा तू । बबुवा तेरे ताऊ सा ,तो धोका दे गए रे ....आ  लल्ला आ .... कहती  हाथ का काम छोड़ उसको बांह से पकड़ खींचती सी विनायक को  झोंपड़ी के पिछवाडे   ले गयी जहां छप्परों वाला छोटा सा गोबर से लिपा पुता  सा रसोई घर था l वहाँ  झाझन का टाट लगा था lजमीन पर चूल्हे के पास घीसू काका सा की विधवा बहू बैठी
थी l॰विनायक को देख उसने हाथ जोड़ दिये , घूँघट जरा और खींचकर  छुई मुई सी अपने में  सिमट
गयी l विनायक ने वहीं कोने में रखी बाल्टी में लोटा डूबा हाथ मुंह धोये और घीसू काका सा ॰व मनफूल काकी सा॰से बोलता बतियाता रहा l ढाक की पतल में भात परोसा गया ,पीतल की कटोरी में अरहर की शोरबे वाली दाल ,कद्दू मिर्ची की तरकारी ,छाछ ,लापसी( मीठा गुड का दलिया) और साबुत छोटा सा कांदा  ...विनायक को एक पल को भी  हिचकिचाहट नहीं हुई ,खाना इतना स्वादिष्ट था कि आनंद आ गया  उसने चटकारे  ले ले कर खाया ,अमेरिका में जो खाया जाता है उसकी तो इस भोजन से कोई तुलना ही नहीं थी ...यह तो जैसे ईश्वर का प्रसाद था l संध्या को बाँस की खपरैल से घिरे छोटे से दालान में तीये की बैठक हुई । हंसली की शक्ल में लोग बैठे । बैठक ख़त्म हुई तो गाँव के बहुत से रिश्तेदार विनायक के इर्द गिर्द मधुमक्खियों से मँडराते रहे । कुछ रिश्तेदारों को विनायक पहचान पा रहा था , बाक़ी घीसू काका सा॰ परिचय दे रहे थे। विनायक काफी थक गया था, रात को निपट अंधेरा था पर चौकी पर लालटेन की ढिबरी उस अंधेरे को दूर कर रही थी । कुटिया के कोने में रखी चटाई पर विनायक लेट गया , जाने कब आँख लग गई ,कब भोर हो गयी उसे पता ही नहीं चला । इतनी सुकून भरी नींद बरसों बाद नसीब हुई थी।अब लौटने का वक़्त हो गया था । मनफूल काकी सा, की आँखों में आंसूं छलक आये थे। रूँधे  गले से बोलीं __"बबुआ आते रहिब !"  विनायक ने तुरन्त कहा- "ज़रूर काकी सा ,अब तो हर बरस चक्कर लगाउँगा. मेरा वादा रहा काकी सा.और हाँ  आप भी अपना और काका सा का ध्यान रखना।" घीसू काका सा ने भी अँगोछे से आँसू पोंछे । सारे रिश्तेदार कार को घेर कर खड़े थे। विनायक के माथे पर तिलक लगा कर उसके मुँह में गुड की डली देती घीसू काका की बेटी आचुकी जीजी भी रो रही थी । विनायक ने सब बड़ों के पैर छुए और जाने क्यों फूट फूट कर रो पड़ा ।शायद उसका मन  इस छोटी सी ठाणी की रस भरी आत्मीयता में डूब गया थाl गाँव की मीठी बासंती हवायें खेतों खलिहानो की ठंडी हवाओं में घुल कर विनायक को मानो  
कह रहीं थी कि  यहाँ का जीवन आज भी व्यावहारिक है शहरों की तरह औपचारिक और यांत्रिक नहीं है ।गाँवों ढाणियो में आज भी बाँस की खोखल से तराशी बांसुरी की मधुर रागिनी मन मोह लेती है। टैक्सी गाँव की कच्ची पगडंडी पर धूल उड़ाती दौड़ रही थी और ढाणी में हवाओं के साथ हरियाये बाँस की डालियाँ हिल हिल कर नत मस्तक होकर विनायक को  जल्दी वापस आने का स्नेह भरा आमन्त्रण दे रही
 थी ।  

7

ईंट की दीवार

गुलमोहर कॉलोनी में रहने वाले हरिहर बाबू और अलीखान बचपन के दोस्त थे lदोनों ने साथ जमीन खरीदी और  साथ ही यहाँ मकान बनवाया l ईद हो  होली या -दीवाली दोनों परिवार साथ मनाते थे l कॉलोनी वाले उनकी दोस्ती की मिसाल देते नहीं थकते  थे l समय गुजरता गया बच्चों की शादियाँ हो गयी ,पोते पोतियों से दौनो के घर आँगन भर गये  lफिर जाने क्या हुआ बच्चों के आपसी मतभेदो के  कारण दोनों दोस्तों की दूरियाँ भी बढ़ती गयी l प्यार वह अब भी करते थे पर अहम की दीवार भी बढ़ती जा रही थी   lघर बनाते समय दोनों परिवारों के घरों के बीच की बाउंडरी वाल पर दीवार नहीं खींची गयी थी , एक दिन कॉलोनी वालों ने देखा कि दोनों के घरों के बीच  ईंटों की दीवार पाटी जा रही हैl उस दिन न हरिहर बाबू ने ,न ही  अलीखान जी ने खाना खाया ! हरिहर बाबू तो सो भी नहीं पा रहे थे l अपने घर के बरामदे में बैठे थे ,बस एकटक खींची दीवार को देखते जा रहे थे, बाहर बज़ रही चौकीदार की लाठी की ठकठक से टूटते सन्नाटे में कभी कभी उनकी सिसकियाँ भी शामिल हो जाती थी !  
रात के करीब दो बजे हरिहर जी  जब अपने  कमरे में बैठे थे तो उन्हे ज़ोर से चीखने की आवाज़ सुनाई दी  ,श्रीमती अली की आवाज़ वे खूब पहचानते थे ,वे फुर्ती से उठे ,देखा मेंन गेट  पर ताला लगा है ,उन्होने आव देखा न ताव  फावड़ा 
उठाया और ईंट की आज ही बनी गीली दीवार पे ठोंकना शुरू कर दिया ! सीमेंट अभी गीला था इसलिये कुछ ईंटें तोड़ कर खिड़की सी बनाई  और  अलीखान के घर में प्रवेश किया  l  घर का दरवाजा खुला था ,अलीखान आँगन में गिरे पड़े थे l श्रीमती अलीखान पानी के छींटे देकर उन्हे होश में लाने की कोशिश कर रहीं थी ,हरिहर जी को देखते ही बोलीं-'देखों न भाईसाहब ,खान साहब को क्या हुआ है , अभी तो बाहर चहल चहलकदमी कर रहे थे ,फिर कुर्सी पर बैठ गए थे ,शायद नींद नहीं आ रही थी  l " 
हरिहर बाबू ने कहा --"चिंता मत करो भाभी जान अभी जगाता हूँ ,ओए नाटककार अली ,उठ देख दीवार गिर गयी है ,उठ जा यार ,कसंम खुदा की अब यह दीवार कभी नहीं उठने दूँगा "
अली खान ने भीगी पलकें उठा कर हरिहर बाबू को देखा और फफक पड़े,  फिर दोनों ने एक दूसरे को बाहों में भर कर प्यार की झप्पी ली l घरवालों ने उन्हे देर तक गले लग कर रोने दिया !  अगले दिन  कॉलोनीवालों ने देखा   ईंट की दीवार ढहा  दी गयी थी l

8
बालदिवस

 सुबह से ही स्नेह आश्रम में हलचल थीl बाहर लॉन में दरी बिछा दी गयी थी और सभी अनाथ बालिकाओं को पंक्तिबद्ध बिठा दिया गया था l राजरानी देवी की तरफ से बच्चों के लिए बाल दिवस के उपलक्ष्य में नाश्ता पानी का आयोजन था l उनकी तरफ से एक लम्बी मेज पर कलफ लगी चमचमाती सफ़ेद चादर पर खाने पीने की सामग्री सजा दी गयी थीl मिठाई के रंग बिरंगे डिब्बे ,फल समोसे ,नमकीन ,पीने के लिए जूस और एक एक जोड़ी परिधान वहां गुलदस्ते में सजे फूलों से शोभा बढा रहे थे !करीब नौ बजे चमचमाती टोयोटा कार आकर बाहर रुकी l कांजीवरम की साडी ,आँखों पर मैला काला चश्मा पहने राजरानी जी जब उतरीं तो बालिकाओं की आँखों में चमक आ गयी l सुबह से वो भूखीं थीं ,पेट में चूहे दौड़ रहे थे l आश्रम की बड़ी दीदी और सहयोगियों ने आगे बढ़ कर उनका स्वागत किया l लॉन में लगी छतरी के 

नीचे उनकी कुर्सी लगा दी गईं थी l वे देर तक आश्रम  की जानकारी लेती रहीं, बीच बीच में साफ़ धुले वस्त्रों में बैठी बालिकाएं बड़े प्यार से उन्हें निहार रहीं थींl घडी की सुईयाँ टिक टिक करती आगे बढ़ रहीं थी l अब धूप लॉन की दिवार फांद बालिकाओं के ऊपर चमक रहीं थी l उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि माज़रा क्या है lसुबह छह बजे उन्हें उठा कर तैयार कर दिया गया था कि आठ बजे गरमागरम नाश्ता मिलेगा l तभी लालबत्ती वाली एक गाडी हॉर्न बजा भीड़ को हटाती आश्रम के  बाहर रुकी और उनके पीछे था कैमरों के साथ  मीडिया का उमड़ता सैलाब , आधे घंटे के स्वागत समारोह में बाल दिवस की महत्ता के भाषण के बाद जब राजरानी देवी मंत्री जी के साथ कैमरे के साथ विभिन्न फोटो खिंचवाती नाश्ता बाँट रहीं थी  तो दो चार बालिकाएं तो बेहोश होने जैसी स्थिति में पहुँच चुकी थी l कुछ  बालिकाओं की आँखों में एक प्रश्न जरुर चमक रहा था कि यह कैसा बाल दिवस है?अब  आश्रम की  किसी भी बालिका की आँखों  में उत्साह और जोश की चमक नहीं दिख रही थी !

9

"नशा !"

तुम  रोज यूँही पीकर आओगे तो सच कहती हूँ मैं घर छोड़ कर चली जाऊँगी  " श्यामली ने पति से कहा तो वह टहाका मार कर हंसा -

"कहाँ जायेगी पर ? रोटी कौन देगा ,तू तो दसवीं पास है ?"

"कहीं भी मजदूरी कर लूँगी पर तुम देख लो तुम्हें रोटी कौन देगा ?"

"हाँ हाँ ,जा.... कल की जाती , आज जा , रौब किसे दिखा रही है ?" वो पलंग पर धड़ाम से गिर कर सो गया


भोर हुई तो देखा दस बज़ गए हैं अब तक भी चाय नहीं मिली है ,वो चिल्लाया -"श्यामली चाय पिला न !"

पर कोई जवाब नहीं मिला ,अब उसका नशा पूरी तरह उड चुका था !

10

"सोने की नसरनी!"

"अरे कलमुही , बेटा   जनती तो हम भी सोने की नसरनी चढ़ते"  ( बेटा होने पर घर के बुजुर्गों को एक सीढ़ीनुमा  सोने की सीढ़ी पर अंगूठा छुआ कर आदर देने का फंक्शन कि वंश बढ़ा!)

   प्रसव के बाद लौटी बहू को ताना   देते हुए पड़दादी ने कहा तो उसकी आँखें भर आई ! पास ही खड़ी दादी ने मालिश करने आई दाई माँ को सुनाते हुए कहा --"अरी  भंवरी, सवा महीने की  पूजन के साथ एक फंक्शन और रखा है  पूरे मोहल्ले को न्योता देना है, आ लिस्ट बना लें !" 

" कैसा फंक्शन बीबीजी?" हथेली पर तम्बाकू  मसलती  भँवरी  ने  पूछा
" अरी   तीसरी पीढ़ी का प्रतित्निधित्व कर रही है मेरी पोती, क्या मोहेल्ले को लड्डू नहीं खिलाऊंगी?  बड़ी धाय को भी तो  सोने की नसरनी चढ़ा कर मान सम्मान दूँगी ना ! "बहू की आँखें फिर भर आयी, पर यह आंसूं ख़ुशी के थे, उन्होंने कृतज्ञता से सासू माँ की तरफ देखा, पड्दादी नि:शब्द  रह  अगले बगले झाँकने लगीं !

11.

डॉलघुकथा :
"करवा चौथ का चाँद !"
करवा चौथ का दिन था! चारों तरफ चहल पहल थी , आकाश बादलों से घिरा था ,चाँद निकलने के कोई आसार नहीं दिख रहे थे ,आज सुबह से ही बूँदा बाँदी हो रही थी! कृष्ण निकुंज का दालान हर  साल की तरह इस वर्ष भी इस पर्व का आयोजन कर रहा था! इस निकुंज में दस फ्लैट थे,जिनमे सभी भारतीय परिवार के लोग थे !  बड़ा उल्लसित करने वाला नजारा रहता थाl सजी धजी महिलाओं के समवेत स्वर और खिलखिलाहट से दालान गुंजायमान हो उठता था ! करवे   और थाल से सजी थालियाँ लिए महिलाए बार बार आकाश को निहारतीं और उनके पति भी बैचैनी से इधर उधर डोलते रह रह कर घडी देखते अखबार के अनुसार इस ८.१० पर चाँद निकलने की संभावना थी ! डीजे   पे  चल रहा था..." आज है करवा चोथ सखी री... "ठुमके पे
थिरक रही महिलाओं में गज़ब का उत्साह था!
श्रीकान्त स्वामी जी भी इस निकुंज  के दूसरे  फ्लोर पे रहते थे उनकी बहू का पहला करवा चौथ था इसलिए उनकी दादी माँ कल्याणी देवी   विशेष रूप से गाँव से आयीं थीं , वह भी इस बदलते स्वरुप को एक कुर्सी पर  बैठी देख रहीं थीं !हैरान भी थी कि किसी भी घर से पकवान मठरी की खुशबू नहीं आ रही थी, सभी के पैकेट कैटरर ने बना दिए थे, कोई प्यासी नहीं थीं, सब कॉफ़ी कोक की चुस्कियां ले रहीं थीं ,अब पति कैसे पानी पिला के व्रत खोलेगे, कल्याणी देवी कुछ कुछ समझ नहीं पा  रहीं थीं ,लेकिन वे मुस्करा रहीं थीं ,उन्हें अपना गाँव भी याद आ रहा था ,जहाँ के हर घर से मठरी पूवे   की खुशबू आ रही होगी और वह हैरान सी सोच रहीं थीं  कि इस अवसर पर तो बादल इतने नहीं होते थे! प्रकृति ने भी रूप बदला है! तभी दूरदर्शन पर न्यूज़ रीडर ने  घोषणा की कि चाँद निकल आया है लेकिन बादलों के कारण बहुत से प्रदेशों में नज़र नहीं आएगा, आप चाहें तो हमारे मॉनिटर पर चाँद देख कर व्रत खोल सकतें  हैं ! फिर क्या था सभी ने टी॰वी॰ के चाँद को अर्क देकर सभी औपचारिकताए पूरी कर लीं थी , जिनके पति बाहर थे उन्होने लैपटाप पर फ़ेस टाइम कर लिया था और व्रत खोल लिया था .... इस बीच डीजे  के स्वर तेज हो गए थे  .. हंसी मज़ाक के साथ .खाने पीने का दौर चल रहा था ,सभी केटरर  के खाने का लुत्फ उठा रहे थे, श्री कान्त स्वामीजी  की दादी माँ कल्याणी देवी   का चाँद पर अभी नहीं निकला था, उनके पति  झाईं गाँव में सरपंच थे, किसी विशेष कार्य के कारण आ नहीं पाये थे  ,कल्याणी देवी को उनकी बहुत याद आ रही थी ,वो अपने पति की तस्वीर के सामने बैठी पूरी रात खिड़की के पास खड़ी अपने गाँव वहाँ की परम्पराएँ पुए- पूड़ी कि खुशबू के बारे में सोचती रहीं थीं और आकाश पर दिखने वाले चौथ के चाँद का इंतज़ार करती रहीं थीं ! 
डॉ सरस्वती माथुर
ए  -2 ,सिविल लाइंस
जयपुर -6
023EAD87-3826-449C-B318-571F4948B850 सरस्वती माथुर 

ए-2 ,सिविल लाइंस ...जयपुर-6 

संक्षिप्त परिचय
नाम : डॉ सरस्वती माथुर
 :शिक्षाविद , कवयित्री,लेखिका सोशल एक्टिविस्ट
 शिक्षा : एम.एस .सी (प्राणिशास्त्र ) पीएच .डी
,पी. जी .डिप्लोमा इन जर्नालिस्म ( गोल्ड मेडलिस्ट )
प्रकाशन
कृतियाँ :
काव्य संग्रह : एक यात्रा के बाद
                     मेरी अभिव्यक्तियाँ
,
साझा संकलन में कहानी कवितायें ,लघुकथाएँ व हाइकु  शामिल

मोनोग्राम : राजस्थान के स्वतंत्रता सेनानी : मोनोग्राम हरिदेव जोशी
विज्ञान :
 जैवप्रोधोयोगिकी 
( Biotechnology पुरस्कार /सम्मान :
प्राप्त पुरस्कार / सम्मान: दिल्ली प्रेस द्वारा १९७० में कहानी " बुढ़ापा "पुरस्कृत एवं अन्य पुरस्कार

भारतीय साहित्य संस्थान म.प्र .द्वारा काव्य में बेस्ट कविता के लिये
Felicitation & अवार्ड given by Association ऑफ़ : डिस्ट्रिक्ट झालावाड द्वारा साहित्य में योगदान के लिये ! जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल 13 में कवितानामा  सत्र में  भागीदारी

विगत कई वर्षों से निरंतर लेखन। कविता,कहानी,हाइकु ,सेदोका ,तांका ,माहिया ,आदि विधाओं   में लेखन  पत्रकारिता, समीक्षा, फ़ीचर लेखन के साथ-साथ समाज साहित्य एवं संस्कृति पर देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं धर्मयुग ,साप्ताहिक हिन्दुस्तान्न ,कादंबिनी ,अहा जिंदगी ,मेरी सहेली ,वामा , मधुमती जैसी पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित ! राजस्थान पत्रिका ,नवभारत टाइम्स ,दैनिक भास्कर ,हिंदुस्तान ,डैली न्यूज़ दैनिक नवज्योति  ,जनसत्ता आदि आदि स्तरीय न्यूज़पेपर में कवितायें ,कहानियाँ ,व आलेखो का निरंतर प्रकाशन !
शिक्षा व सामाजिक सरोकारों में योगदान, साहित्यिक गोष्ठियों व सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी, विभिन्न साहित्यिक एवं शिक्षा संस्थाओं से संबद्ध, ऑथर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया, पब्लिक रिलेशंस सोसाइटी ऑफ़ इंडिया राजस्थान चैप्टर की सदस्य व पूर्व उपाध्यक्ष , गिल्ड ऑफ वुमेन अचिवमेंट की राजस्थान की प्रतिनिधि l इनर व्हील ,लायनेस क्लूब की पूर्व सचिव व रोटरी क्लब जयपुर सेंट्रल की पत्रिका की संपादिका व रोटरी क्लब डिस्ट्रिक्ट 305 की पत्रिका जीएमएल की  पूर्व वाइस चेयरमैंन पब्लिकेशन  
दूरदर्शन व आकाशवाणी  से निरंतर रचनाओं का प्रसारण  व सक्रिय भागीदारी
विभिन्न देशों  यू एस ए ,कनाडा ,लंदन ,केमेन आईलेंड में संस्कृति के  अध्ययन के लिए  अनेक बार भ्रमण !

संपर्क:
नाम : डॉ सरस्वती माथुर
ए---२ , हवा सड़क ,सिविल लाइन ,जयपुर-६
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.नाम : डॉ सरस्वती माथुर
प्राचार्य
ऍम .एस.सी ,पी .एच. डी)
जन्मतिथि: 5 अगस्त
शिक्षाविद एवम सोशल एक्टिविस्ट
साहित्य :देश की साहित्यिक पत्रिकाओं में कवितायेँ ,कहानियां ,आलेख एवम नये नारी सरोकारों पर प्रकाशन
प्रकाशन ४ कृतियाँ प्रकाशित
संपर्क :ए -२ ,सिविल लाइन
जयपुर विगत कई वर्षों से निरंतर लेखन। कविता, कहानी, पत्रकारिता, समीक्षा, फ़ीचर लेखन के साथ-साथ समाज साहित्य एवं संस्कृति पर देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन।
शिक्षा व सामाजिक सरोकारों में योगदान, साहित्यिक गोष्ठियों व सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी, विभिन्न साहित्यिक एवं शिक्षा संस्थाओं से संबद्ध, ऑथर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया, पब्लिक रिलेशंस सोसाइटी ऑफ़ इंडिया राजस्थान चैप्टर की सदस्य।