सोमवार, 16 नवंबर 2015

मेरी कुछ कविताएं


  
डॉ सरस्वती माथुर

"मैं जीना चाहती हूँ !"
एक गिलहरी की तरह
कभी कभी मैं
कुतरती हूँ
 अपना वक्त
जो घसियारे सा
काटता रहता है मुझको
और बंद रखता है
देह पिंजरे में रूह  को
मैं खोलना चाहती हूँ
इस देह का पिंजरा
 ताकि उड सकूँ
रात में सपने का
बुक्कल पहन
सुदूर आसमान में
 और फिर भोर होते ही
 लौट आऊँ
देह के पिंजरे में
क्यूंकि मैं जीना चाहती हूँ
फूलों के रंगों के साथ
बसंत के मौसम के साथ
चाँद तारों की  रात के संग
भिनसारे में चहकती
चिड़िया के संग
मैं देखना चाहती हूँ
उगते सूरज के संग
उगती सिंदूरी लाली 
जो ओढ़े रहती है
सिंदूरी पल जब वो
सागर का चुंबन कर
धूप के मोती लुटाती है  
मैं जीना चाहती हूँ
तितलियों के संग
जो फूलों पर उड
उनसे मकरंद चुराती है
मैं डूबी रहना चाहती हूँ
रिश्तों की चाँदनी में
और थोड़ा- थोड़ा
 छूट जाना चाहती हूँ
सभी  अपनों  के दिल में
धड़कन की  तरह !
डॉ सरस्वती माथुर
2
"बीज़ हूँ मैं !"
बीज़ हूँ मैं
वहीं उगी
जहां गिरी थी
कच्चा पौधा जब उगा
तो बहुत मुलायम था  
हरा था 
हर पौधे और
फूल का
 होता है अपना रंग
उसके बढ्ने की विधि
 मेरा भी एक रंग था
 विकास की प्रक्रिया थी
 सो बढ़ती रही
 पौध से पेड़ बनी
 शाखाओं सी फैली
 पातों ने
 हवाओं से सोखीं
रसभीगी नमी
मेरे तने को दी
 एक मजबूत जमीं
यहीं फैलूँगी अब
फल दूँगी और
बीज़ बन कर
बार बार उगूँगी
बस मेरी इस माटी को
उर्वर रहने देना
बस उर्वर रहने देना
डॉ सरस्वती माथुर
 "नीम खामोशी में !"
मैं फिर चढ़ूँगी
उगते सूरज सी
 सपनों के पहाड़ों पर
 मौसम  की
अनमन हवाओं में
 और धूप बन
 झरती रहूँगी
 हर मौसम में
 बस चौमासे में
 निरंतर न
आ पाऊँगी क्यूंकी
तब बादलों का
 साथ निभाऊँगी
 हाँ संध्या में
चाँदनी बन चाँद संग
 हवाओं की सरगम में
 नए गीत
 गुनगुनाऊँगी और
 फूलों से रंग चुरा के
 तितली  बन
बसंत के मौसम में
रसपगी रागिनी छेड
 नूपुर सी बज़
पतों -शाखों में समाकर
 हरियाली बन जाऊँगी
 पर तब तक मुझे
 अन्तर्मन की
 नींद  नदी में
 ख्वाब बन कर बहने दो
अपने ही मन की
 नीम खामोशी में
कैद रहने दो !
डॉ सरस्वती माथुर
क्षणिकायेँ 
1)
नि:शब्द मन
कितना कुछ कहता है
बिलकुल वैसे ही
 जैसे मौन पहाड़ से
निकल कर झरना
हाहाकार मचाता
जाने क्यों
बिखरी धुंध की
बुक्कल ओढ़
नदी से मिल
कलकल रोता है l
2)
अलाव सा
कभी कभी हो जाता है
मन हुमारा
जलता- बुझता
सर्द मौसम में
ताप भरता
फिर ठंडा हो 
राख़ हो जाता है 
कभी कभी उड  
जज्बाती हवाओं में
बिखर खो जाता है l
3 )
अब पहचान के
रंगीन दायरे
बहुत सिमट गये हैं
सम्बोधन के
 मीठे चिरौरी से
शहदीले  शब्द भी
मुखर नहीं रहे
जाने क्यों
प्रीत प्रेम के रंग
अब चढ़ते नहीं
शायद रंगने वाले
अब रंगरेज़ नहीं रहे l
4)
पहचानने लगी हूँ
अब उन लोगों को
जो शब्दों से
बिछाते हैं
परिचय  का बिछौना और
मौसम बदलते ही
विश्वास का चेहरा
बदल लेते हैं !
5 )
पीले पन्नों पर
धुंधले पड गये
चिट्ठियों के अक्षर
पर उन यादों का
क्या करूँ जो
वक्त के साथ
गहरी होती जाती है l
डॉ सरस्वती माथुर
.................................................................................................... 
परिचय :
नाम : डॉ सरस्वती माथुर
शिक्षाविद एवम सोशल एक्टिविस्ट ,कवियत्री-लेखिका - साहित्यकारव हाइकुकार
साहित्य :देश की साहित्यिक पत्रिकाओं में कवितायेँ ,कहानियां ,आलेख एवम नये नारी सरोकारों पर प्रकाशन
प्रकाशन ४ कृतियाँ प्रकाशित व साझा संकलन में कवितायें ,हाइकु संकलित
काव्य  संग्रह :दो
1॰एक यात्रा के बाद
2.मेरी अभिव्यक्तियाँ
जयपुर विगत कई वर्षों से निरंतर लेखन। कविता, कहानी, पत्रकारिता, समीक्षा, फ़ीचर लेखन के साथ-साथ समाज साहित्य एवं संस्कृति पर देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन।
शिक्षा व सामाजिक सरोकारों में योगदान, साहित्यिक गोष्ठियों व सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी, विभिन्न साहित्यिक एवं शिक्षा संस्थाओं से संबद्ध, ऑथर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया, पब्लिक रिलेशंस सोसाइटी ऑफ़ इंडिया राजस्थान चैप्टर की सदस्य।
संपर्क
:ए -२ ,सिविल लाइन
जयपुर -6
............................................................................................................................................................................................................................................................... 

डॉ सरस्वती माथुर.
 कविता क्या है मेरे लिये ....

मेरे लिये जीवन ह़ी कविता है ,कविता ह़ी जीवन है l कविता की लाखों परिभाषाएं हैं क्युंकि उसके आयाम अनेकों हैं, नींद में साँस चल रही है वह भी लयात्मक कविता है , जहाँ गति है वहाँ कविता है ...कविता एक साधना है, भावना हैl कविता ... सृष्टि ,देश, समाज, परिवार, प्रकृति ,अहसास- अनुभूति और अभिव्यक्ति का कलात्मक आकलन है, साक्षात् इश्वर से बातचीत का
माध्यम है ! शायद इसलिए मेरी अभिव्यक्ति कि केंद्रीय विधा भी कविता ह़ी है .
 नाम : डॉ सरस्वती माथुर
परिचय :
 :शिक्षाविद , कवयित्री,लेखिका सोशल एक्टिविस्ट
शिक्षा : एम.एस .सी (प्राणिशास्त्र ) पीएच .डी
,पी. जी .डिप्लोमा इन जर्नालिस्म ( गोल्ड मेडलिस्ट )
प्रकाशन
कृतियाँ :
काव्य संग्रह : एक यात्रा के बाद
                     मेरी अभिव्यक्तियाँ
,

मोनोग्राम : राजस्थान के स्वतंत्रता सेनानी : मोनोग्राम हरिदेव जोशी
विज्ञान :
 जैवप्रोधोयोगिकी 
( Biotechnology पुरूस्कार /सम्मान :
प्राप्त पुरस्कार / सम्मान: दिल्ली प्रेस द्वारा कहानी " बुढ़ापा "पुरुस्कृत १९७० में एवं अन्य पुरस्कार 
भारतीय साहित्य संस्थान म.प्र .द्वारा काव्य में बेस्ट कविता के लिये
Felicitation & अवार्ड given by Association ऑफ़ : डिस्ट्रिक्ट झालावाड द्वारा साहित्य में योगदान के लिये !
जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल  के कवितानामा में भागीदारी
काव्य व हिन्दी को बढ़ावा देने के लिए परिकल्पना सार्क शिखर सम्मान से सम्मानित
विगत कई वर्षों से निरंतर लेखन। कविता, कहानी, पत्रकारिता, समीक्षा, फ़ीचर लेखन के साथ-साथ समाज साहित्य एवं संस्कृति पर देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन।
शिक्षा व सामाजिक सरोकारों में योगदान, 
दूरदर्शन- आकाशवाणी ,साहित्यिक गोष्ठियों व सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी, विभिन्न साहित्यिक एवं शिक्षा संस्थाओं से संबद्ध, ऑथर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया, पब्लिक रिलेशंस सोसाइटी ऑफ़ इंडिया राजस्थान चैप्टर की सदस्य।पीआरसीआई वुमेन विंग ) की फॉर्मर चेयरपर्सन   ,गिल्ड ऑफ वुमेन अचिवर्स की स्रजस्थन प्रतिनिधि !
संपर्क:
नाम : डॉ सरस्वती माथुर
ए---२ , हवा सड़क ,सिविल लाइन ,जयपुर-६
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.नाम : डॉ सरस्वती माथुर
ऍम .एस.सी ,पी .एच. डी)
जन्मतिथि: 5 अगस्त
शिक्षाविद एवम सोशल एक्टिविस्ट
साहित्य :देश की साहित्यिक पत्रिकाओं में कवितायेँ ,कहानियां ,आलेख एवम नये नारी सरोकारों पर प्रकाशन
प्रकाशन ४ कृतियाँ प्रकाशित
संपर्क :ए -२ ,सिविल लाइन
जयपुर विगत कई वर्षों से निरंतर लेखन। कविता, कहानी, पत्रकारिता, समीक्षा, फ़ीचर लेखन के साथ-साथ समाज साहित्य एवं संस्कृति पर देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन।
शिक्षा व सामाजिक सरोकारों में योगदान, साहित्यिक गोष्ठियों व सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी, विभिन्न साहित्यिक एवं शिक्षा संस्थाओं से संबद्ध, ऑथर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया, पब्लिक रिलेशंस सोसाइटी ऑफ़ इंडिया राजस्थान चैप्टर की सदस्य।...
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मंगलवार, 10 नवंबर 2015

जलता दीप/ शुभ दीपावलीआई

"जलता दीप!"
कौन कहता है
मेरी देहरी पर
जलता दीप
आँधी तूफानों से
लड़ता नहीं है
वह जलता है
रिसता है फिर
कशमकश के बाद
बुझता है
तलवार सी
जलते दीप की लौ को
कई बार मैने
वार करते देखा है
विश्वासों की बाती को
लड़ते देखा है
रात भर जुगनू सा
उड़ते देखा है
कतरा कतरा तेल में
सिकुड़ते देखा है
परिशून्य में अन्त तक
दीप के जादुई
सम्मोहन को
तब तक कंपकंपाते
थरथराते देखा है
जब तक भोर की
पहली किरणे
अपनी झीनी रोशनी मेँ
सुरक्षा कवच तोड
कालिमा की सियाही को
चौखट पर दर्प से उगते
सूरज की वेदी पर
समाहित कर 
उसके अस्तित्व मेँ ख़ुद
समर्पित नहीं हो जाती
तब तक दीप को
 मैने जलते देखा है!
2
"शुभ दिवाली आई !"
तिमिर मिटाने
लड़ियाँ दीपों की सजी
शुभ दीवाली आई
चहुं दिशाएँ
जगमग चमकी
रातरानी दहकाईं

आँगन चौबारों में
रँगोली थापी
अमृत बरसाती रातें
पटाखों से काँपी
पावन धरा पर
माँ  लक्ष्मी  मुस्कुराईं

बंदनवारों से
घर देहरी लहकीं
जयोतिमय फुलझडियां
चिडचिड करती चहकीं
समता सदभाव करूणा की
अनुपम ज्योत झिलमिलाई।
डाँ सरस्वती माथुर ।


बुधवार, 4 नवंबर 2015

मेरी कविता...."रेत के घरोंदे!"

हमेशा ही
कमजोर नहीं होते
 रेत के घरोंदे
देखती हूँ कई बार
बेलागाम दौड़ती
समुंद्री लहरे भी
उन्हे नहीं ढहा पातीं
कैसे ढहातीं
वो तो  धीरे  धीरे
मजबूत हुआ था
उसकी दीवारों के
 इर्द गिर्द समय ने
विश्वास की पथरीली
 बाड़ लगा दी थी
जिसे रोज समय
विश्वास की अपनी
 मुस्कराहट की
धूप से सींचता था
चाँद अपनी चाँदनी संग
वहाँ बैठ घंंटों
 बतियाता था क्योंकि
हवाएँ वहाँ रोज
नए सपने बुनती थीं
और ममत्व भरी
रात वहाँ सितारों के साथ
जगराता करती थी
 फेन अपने चिलमन से
ढक उसे रोज
संवारती थी और
बहुत सी समुंद्री चिड़ियाएँ
वहाँ अपने पंख खोल
चक्कर लगाती थी
वहीं इस घरोंदे के पास
अशब्द गूंगे
 पत्थरों ने शिवालया
उकेर दिया था
और जल ने अपना
 नमक बिखेर कर
मिथकों को कैद में
बांध कर एक
नाम दिया था
यह रेत का घरौंदा
सभी के लिए अपने
मौन को मुखर करने का
माध्यम था क्योंकि
यह प्रेम का द्वीप था l
डॉ सरस्वती माथुर
15.6.15 को रची

सोमवार, 2 नवंबर 2015

सेदोका....२।११।१५

सेदोका
1.
मन लहरें
उठती गिरती हैं
सुधियों के सागर
बूंदें बन के
सीपियों के खोल में
मोती सी ढलती हैं l
2
परिक्रमा की
सूर्य ने धरती पे
समूचे क्षितिज पे
धूप चमकी
नए नए रंगों से
धरती भी दमकी l
3
रतजगा था
चाँद का गगन में
उनींदी हो चाँदनी
भोर हुई तो
धूप सेज सज़ा के
सागर में जा सोयी l
4
गीत गाती है
बहना चाहती है
नदिया कलकल
दूर जाती है
समुन्द्र में समा के
 गहरी थाह पाती l
5
सूर्य का घोडा
 हिनहिनाते हुए
धूप के पीछे दौड़ा
 धरा  को छूके
 धूप कूदी सिंधु में
  छिपी क्षितिज  पार l
6
 गुडीमुडी सी
हवाओं नें जगाया
तो कुलबुला कर
 तरु पे बैठे
पंछियों के झुंड भी
घोंसलों से निकले l

डॉ सरस्वती माथुर


क्षणिकाएँ.... नयी रचनाएँ !

मैं उदास थी
खामोश रात थी
देर तक चाँद से
बतियाती रही
मन की अनकही बातें
दोस्त मान उसे
सुनाती रही

मुझे  लगा
चाँदनी ने ओस सा
भीगापन टपका कर
उस रतजगे पर
अपनी मोहर लगा दी
और मुझे लगा
मैं अपनी भावनाओं की
वसीयत बना
उसे सौंप दी है
सुरक्षित रखने को l
17.3.15)

2
कभी कभी
घायल पाखी सी
रात भी छटपटाती  है
अमावस पे मौन हो
वो दर्द से कराहती है
बिना चाँद चाँदनी के
सुबह होने पर
उसकी सांसें तन्हाई केउसे सौंप दी है
समुन्द्र में डूब जाती है
देर तक अकेलेपन की
किरचियाँ जलपाखी सी
तिरती रहती है

जब फिर लौट के
 आता है चाँद तो
रात के गले लग
 पूरे आकाश में
बुनता रहता है
जुदाई के अनकहे
लम्हों को रिश्तों के
यह अलाव पूनम तक
जलते रहते हैं
उनके पाक रिश्तों की
 कहानी कहते हैं l
3

"बांस हूँ मैं !"
अभिनंदन करो
मेरे अस्तित्व को
रंगों से भरो
 मेरा मौन
 मेरा दर्शन है
राग रागिनी का
अद्भुत संगम है

मेरी खोखल का शून्य
बांसुरी बन जाता है
मेरे मौन को वाणी देता है
चिंतन करो
मुझे ना काटो
 हरीतिमा भर
मेरी डाली बन
जंगल में
मंगल  कर डालो

कोयल जब
मेरे झुरमुट में
आकर बोलती है
मेरी वर्णमाला में
रंग भर देती है
मुझे ना छाँटो
हवा ,धूप ,रंग
निरंतर बदल रहे हैं
 पुराने गांवों में
आज भी मैं
 झोंपड़ी का बाड़ा हूँ
पशुओं का भी मैं
मनपसंद चारा हूँ

बांस हूँ मैं
मुझे ना बांटो न
कृषक ,श्रमिक
व लेखकों का
चिरसखा हूँ
नहीं मैं बंजारा हूँ
 मुझे सँवारो
 जंगल की
 जीवनदायिनी
 सांस हू मैं !
डॉ सरस्वती माथुर




दीपावली पर रचनाएँ ---1 .11.15


"लक्ष्मी का आवाहन !"
घर पावन मन भी पावन 
दीप ज्योति लगती मनभावन 
 

रोशनी की नदी
चहुं ओर बह रही
मन मंदिर बन गया
जन जन से कह रही


लक्ष्मी माँ का आवाहन
दीप ज्योति लगती मनभावन
पूजा थाल में
मेवे संग मिठाई है
अनार पटाखों की गूंज
चहुं ओर छाई है


द्वार पर बंदनवार सुहावन
दीप ज्योति लगती मनभावन
डॉ सरस्वती माथुर


माहिया
ज्योति की बंदनवार
तुम कब आओगे
सजन जी मेरे द्वार l

देहरी दीपक जला
मन के आँगन से
अमावस का तम ढला

है दीप संग बाती
आई दिवाली
यादें तेरी आती l

है प्रेम दीप जलता  
सपनों का  सजना
 नैनो में आ मिलता  l
मुक्तक
लड़ियों के हैं हार
दीप पर्व तैयार
जन जन पे छाया
सज़ा घर परिवार
................................
हाइकु
दीपमालिके
अन्तर्मन में जल
तम हरती l

धरा पे  बहे
मावस की रात को
दीप झरने l

बाती जलती
पंक्तिबद्ध दीपों को
पूनम करतीl

अंधेरा गले
दीप से दीप जब
संग में जले l

दीपों की चाह
अंधेरा चीर
बनाना राह l

दीप के हार
रोशनी की लड़ियाँ
आँगन द्वार l

बाती सा प्रेम
मन दिये में रख
जलाना होगा।
.........
"दीवाली शुभ आई!"
....तिमिर मिटाने
सजी लड़ियाँ दीपों की 
दीवाली शुभ आई
चहुं दिशाएँ 
जगमग चमकी
रातरानी लहराई

आँगन चौबारों में
रँगोली थापी
पटाखों से रातें काँपी 
अमृत बरसाती 
पावन धरा पर 
लक्ष्मी माता मुस्कुराईं

बंदनवारों से 
घर देहरी हल्की
जयोतिमय फुलझडियां 
चिडचिड करती चहकीं
समता सदभाव । करूणा की
अनुपम ज्योत झिलमिलाई।

........
.सेदोका
1
दीप प्रेम का
विश्वास की  बाती से
जला के रख दिया
मन के द्वारे
रोशन हो चमके
घर आँगन द्वारे l
2
 मावसी रात
 घर आँगन द्वार 
ज्योतिर्मय कर
तिमिर हरा
आस्था की बाती जला
दीप में तेल भरा l
3
तांका
घर में जले
जब दीप माटी के
अन्तर्मन का
तिमिर भी भागा
सद्भाव की बाती से

........................................
गीत
"जल रे दीप जल !"

 बाती  को बांध कर
 जल रे दीप जल

 कभी ना छाने पाये
 कालिमा का पाखंड
आँधी तूफानो में भी
लौ को रखना अखंड

करना नहीं छल
जल रे  दीप जल

सद्भाव की बांध डोरी
बंदनवार सजाना
बन चाँद की चकोरी 
मंगलदीप जलाना

मिलेगा मन को बल
जल रे दीप जल l
डॉ सरस्वती माथुर
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
कविता
आज भी मिलता है
राम को वनवास
पर वो दिखता नहीं है


सच के राम हारते भी हैं
विश्वास के कुंभकरण
कहाँ समय से  जागते हैं?
 लक्ष्मन का ईमान भी
  कभी बिकता नहीं है
पर वो दिखता नहीं है

आज भी सीता की होती है
आए दिन अग्नि परीक्षा
आज भी कैकई देती है
भरत को झूठी शिक्षा
 हाँ वो झुकता नहीं है
पर वो दिखता नहीं है


 कपट छल फैला हुआ है
 घर घर में देख लो
सब का मन मैला हुआ है
लंका भेदी आज भी हैं
 पर कपटी रावण
कभी मरता नहीं है
पर वो दिखता नहीं है l
डॉ सरस्वती माथुर

आओ  दिवाली मनाएँ
मन का मैल धो डालें
नयाऐशता बांध कर
एक नया युग ले आयें
आओ दिवाली मनाएँ
झूठ सच चलता रहेगा
पाप पुण्य का तराजू
ऊपर नीचे हिलता रहेगा
पर हम अगर अकेले ही
चल कर संग कारवाँ
एक नया बांध कर
कर्म साध कदीलों



















सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

पाण्डुलिपि :हाइकु

"दुआ के फूल !"
1
दुआ के फूल
रूह चिड़िया को भी
हैं लौटा लाते l
2
मन है बांटें
भावों   के गुलदस्ते
 हवा महकें l
3
मेरा ये मन
तुम्हारी दुआओं की
चाह  में बीता  l
4
खोल के देखो
 दुआ के दरवाजे
चैन मिलेगा l
5
विश्वास बुनो 
 दुआओं का सूरज
   उदित करोl
6
तेज भँवर
 किनारा पा लिया तो
दुआ जिंदगी  l
7
खामोश दुआ
मीलों तक का रास्ता
कंटकविहीन l
8
जाल फैंकता
स्वार्थ का बहेलिया
आओ छुड़ाएँ l
9
लगे अगर
 जमीर पर चोट
 सज़ा ज़िंदगी l
10
यादें
1
विकल प्राण
 यादों की आहट है
 उल्कापात सी
2
भीगी यादें हैं
 मधुर क्ष ण बीते
 मन हैं रीते
3
  यादें रेशमी
 नीर बहते हुए
 जल बिन्दु से
4
 यादों की डोरी
 बिस्तरबंद मन
 बंधा ही रहा
5
 यादों के पथ
 मन की  पगडण्डी
 भटके हम
6
यादों भरे हैं
 मधुकुम्भ मन  के
 फिर भी प्यासा
7
 तारों भरी है
 यादों की रजनी भी
 मन भी दिप्त
8
 गरजती सी
 यादों भरी है आंधी
  उड़ा मन भी

9
  .धूप सी यादें
  सूरज से उतरी
   मन धरा पे
      12
   मन तितली
   यादों के फूलों पर
   मंडराती सी
        13
     मन लहरें
     दरिया के पानी सी
     बहती यादें
           14
     यादें बहकी
     छलकते जाम सी
      मन छलका
            15
     मन आकाश
     चमकती हैं  यादें
      चाँद तारों सी
              16
     यादें अंकित
     मन कैनवास पे
     तस्वीरों जैसी
            17
    खामोश यादें
    आँखों में आंसू बन
     शाम -बरसीं
             18
     .यादों के लम्हे
      साथ साथ चलते
       दोस्त हो गए
            19
     .स्वेटर बुना
      यादों भरी ऊन से
      मन सलाई
          20
       शहनाई सी
     मन  की दुनिया में
        गूंजती यादें
          21
      यादें गरजें
     सावन की घटा सी
      मन- बरसे
          22
    .भटकी यादें
    आवारा बादल सी
     बिन बरसे
         23
   यादों का चाँद
    खोये खोये मन सा
    गगन चढ़ा
         25

      आंसू  के  जैसी
      यादें -पलकों सजी
        ठहरी रहीं
            26
         हौले से आयीं
         पतझड़ सी यादें
           मन उदास
              27 
        मन पाखी सा
        यादों के पिंजरे में
           छटपटाता
               28
          मन डोर पे
         पतंग सी यादें
           गगन उड़ीं
               29
            भीगा मौसम
            यादें अंकुरित हो
             उगती गयीं 

             30
     घटा के पंछी!
    1
   घटा के पंछी
  नभ में उड़ते हैं
   फैला के पंख
   २
जल लहरें
मिट्टी के घरोंदों को
बहा ले गयी 
3

मेघ भरें हैं
नभ के दालानों में
धूप छांह से l
बारिश आई
जंगली गुलाब सी
खुशबू छाई l
छाई घटा तो
मोर बांध घुंघरू
बागों में आया
मन विभोर
मोरनी संग झूमा
बावरा मोर
आई वर्षा
बूंदे बन्दनवार
छटा अनूठी l
वर्षा ऋतु में
पुरवाई सी बही
मन में यादें l
मेघ पहन
बिज़ली की पायल
नाचे नभ में
१०
पहली घटा
सावन की आई तो
मन भीगा l
११
चह्चहाती
सावन की चिड़िया
तरु पे डोली l
१२
मैं सावन की
घटा बन पहुंची
बाबुल के चौरे l
अकेलापन 
1
अकेला पाखी
तरु को छोड़ कर
प्रवासी  हुआ l
2
 दीप अकेला
अंधकार बुहार
जलता रहा
3
उम्र की संध्या  
सूरज की तरह
डूबती गयी l
4
गिरते पत्ते
हवा संग घूमते
तरु अकेला l
5
रुक के देखे
अकेला सा बुजुर्ग
डूबता सूर्य l
5
उदास मन
 अकेलापन ओढ़े
डूबता गया l
6
बिछडे पात
तरु अकेला झेले
 यह आघात l
7
जीवन साँझ
हिरणी सी दौड़ती
सूरज पीतीl
8
 सूने दालान
घेरता अकेलापन
डूबता मन l 
9
 साथी ढूँढता
जीवन सफर में
अकेला मन l 
10
शाम का तारा
अकेलापन हमें
लगता प्यारा l
11
दूर तलक
हाथ थाम साथिया
अकेला मन l 
12
आज का दौर
मेरा अकेलापन

मिट्टी सा मन l

"प्रेम!"
1
ऋतु प्रेम की
बसंती हवाओं में
बिखरे रंग
2
प्रेम दीपक
जला जब मन में
खिला यौवन l
3
प्रेम जुगनू
भावों की बाती जल़ा
रौशन हुआ l
4
प्रेम गुलाब
मन को महकाए
नींद उडाये l
5
प्रेम पराग
मौसम पे बरसा
तितली मन l
6
प्रेम से भरी
भूली बिसरी यादें
महका मन l
7
प्रेम पावन
कलकल नदी सा
बहता जाये
8
प्रेम का रंग
दहके पलाश सा
मन रंगता
9
प्रेम पलाश
फागुन हुआ मन
बसंत संग
10
भीगा ये मन
मौसम ने बजाई
प्रेम मृदंग l...
."चिड़िया मन !"
 
पेड़ों के साये
लरजती धूप में
तपतपाये l
2
मन आकाश
पतंग सी लुटती
नींद हमारी l
3
यादें रोक लें
मन में चलो अब
लगाएं कर्फ्यू l
4
सजी संवरी
चांदनी को देख के
चाँद बिखरा l
5
नींद नभ में
ख्वाब पलकों पर
चिड़िया मन l
6
भीगे मौसम
मन की डायरी पे
स्याही फैलाए l

बिछड़े पात
तरु अकेला झेले
यह आघात
8
संध्या की चुन्नी
रंगरेज सा रँगें
डूबता सूर्य l
9
चाँद तारों की
चौपाल बैठी साथ
हुई जो रात l
10
रूह अकेली
शरीर घर छोड़
यात्रा को गयी l
चाँदनी बुनकर
1
एक पीपल
मन खण्डहर में
याद का उगाl
2
सर्द  हवाएँ
शाम की पुरवाई  में  
थिर हो जमी l 
3
चुप्पी तोड़ते  
खंडहर हवेली में
चूहों के बिल l
4
मौन तोड़ती 
अंधेरे में चिड़ियाँ
देख शिकारी l
5
हवा सा मन
आकाश नाप कर
ख्वाब बुनता l
6
 नि:शब्द नैन
मन की पीड़ा बुन 
नींद  चुराते
7
कौन आयेगा
ख्वाबों में बस कर
नीड बनाने ?
8
नभ से  भागी
चाँद संग चाँदनी 
हुई प्रवासी l   
9
 चाँद जुलाहा
 चाँदनी बुन कर
 प्रेम पिरोता l
10
यौवन आया
निंदियारी अँखियाँ
 घिरी स्वप्न सेl
"धरा पे जन्नत !"
1
पातों पे लगे
शबनमी बिस्तर
धरा जन्नत !
2
नदिया देती
सागर को अस्तित्व
खुद खो जाती !
3
आयु की बही
समय महाजन
लिख रहा है l
4
 टूटा घरोंदा
हवा कश्तियों पर
लहरें चढ़ी l
5
दोपहरी की
पकड़ के सीढियां
सूरज चढाl
6
नदिया देती
  सागर को अस्तित्व
खुद खो जातीl
7

ललाती साँझ
नभ की पाग पर
कलगी लगे
8
सागर रेत
प्रेयसी सी तट पे
बिन जल सूखी
 9
पूनम चाँद
कृष्ण पक्ष आते ही
पिघल गया
10
सूर्य निकला
स्वर्णिम रथ पर
सागर पारl
" नींद की परी "
1
सपना गिरा
उड़न तश्तरी सा
जाने कहाँ पे ?
2
.रवि रथ ले
भोर आई तो, पाखी
चह्चहांये l
2.
खाली पन्नो सी
 जिन्दगी की किताब
स्याही से स्वप्न
3.
फूल खिलो भी
तितली ने तुम  पे
रंग बिखेरे  l
4.
मधुर गीत
चिड़ियाँ ने गा कर
धरा गुंजाई l
5.
रात- जुगनू
दिन के उजास में
कहाँ पे छिपा ?
6
नींद की परी
सपनो से  खेलती
आँख मिचौनी l
7
सोया सा गाँव
मुर्गा जब बोला तो
शहर हुआ l
8
चाँद की रोटी
रात थाली में रख
नभ ने खाई l
9
हम हो जाओ
अहम् का" अ" हटा
साथ निभाओ l
10
रास्ता है मुडा
दो पल जो जुडा था
फासले बढे l


उनींदी आँखें

आँख की नमी
एक उच्छ्वास में
मोती सी बनी
खाली आँखों से
देख रही बूढी माँ
बेटे की राह
उनींदी आँखें
सपनो के नभ में
झुला झुलाये
धुंधली आँखें
उम्र की चौखट पे
खड़ा बुजुर्ग
पूजो चरण
आँखों में सपने ले
खाद बुजर्ग
उनींदे नैन
बुन रहे सपने
भरे वितान
मोम सी बूँद
धरा आँख से गिरी
ओस नाम है
आँख मिचौनी
खेलती धूप छांह
बदल संग
नींद की पारी
सपनो में खेलती
आँख मिचौनी
१०
मीठी सी नींद
जागे से सपने ले
आँखों में तैरी
११
ख्वाबों के दीये
आँखों में जलते से
नींद की बाती
१२
चाँद बदल
खेलें आँख मिचौनी
छिपे तारे भी
१३
आँखों की क्यारी
बो दी है नींद भर
सपने उगे
१४
यादें भरी हैं
आँखों में लबालब
छलके आंसूं
१५
ख्वाबों के पाखी
आँखों में उतरे हैं
नींद नभ में
१६
बहिन उर
भाई का प्यार छिपा
लोचन गीले
१७
परदेस में
भीगी भाई की आँखें
रक्षा पर्व पे
१८
मुखड़ा भोला
नैनो से है रिझाए
मुरली वाला
१९
चल नैन
माखन चोर लल्ला
तोड़े मटकी
२०
यादों के तारे
आँखों के नभ पर
हैं चमकते
२१
नीले सपने
मन आँखों में
नारी है देखे
२२
कैद करा है
चाँद की चांदनी का
आँखों में अक्स l
"मन के शब्द !"
1
प्रेम का सिक्का
 घर पर खो गया
 बुजुर्ग ढूंढे
 2
 गिरते पत्ते
 हवा संग घूमते
तरु अकेला
 3
 धरा के पास
आई पाहुन बनकर
 बूँद ओस की
 4
मन होता है
 एक खुली किताब
 पढ़ते जाओ
5
उड़ती फिरे
सुबह  की चिड़िया
पंख पसारेl
6
मन के शब्द
जीवन कागज पे
 लिखे मिटाए l
7
पुराने घर
 झर झर गिरते
 रूहें हैं रोती
8
 भोर के रंग
 किरणों की चिड़ियाँ
 धरा पे लायी
 9
दिल झरोखा
यादें आई -बैठीं तो
 महका मन
 10
मन फूलों पे
 खुशबू सी चिट्ठियाँ
 महकी सांसेंl

"पाहुन मन !
रोली चन्दन
कभी मन लगता
  ज्यों वृन्दावन l
2.
चाँद बौराये
 चाँदनी देख के
 वो  ठंडा हो जाए l
3॰
 पाहुन मन
पहुंचा तुम तक
 करो स्वागत l
4
नभ अकेला
चहचहाये पाखी
तो सज़ा मेला l
5
 मन बुहार
 यादों की हवाएँ भी
 शांत हो गयीl

 1.
निर्मोही मेघ
बिन बरसे गया
धरा अवाक  l

यादें  टेरती
सावनी बदरिया
जब घेरती l

मन की धरा
झरना बन जाती
 हिलोरें खाती l

चलो रे मन
चंचल हवाओं से
गति ले आयें l

शोर उड़ाती
यादों की गौरैया तो
मन उडता l

धूप  का रथ
तप्त धरती पर
दौड़ लगाये l

 रात थी सोयी
भोर की कोयल ने
उसे उठाया l

चंचल मन
हवाओं के संग
रास्ता ही भूला l

इचक दाना
हवाएँ हैं गातीं
किसे बुलातीं l
१०
है ता ता थैया
करती नदिया
सागर देख l
............................
.
डॉ सरस्वती माथुर
  1
धूम धाम से
 चढ़ता है सूरज
 धूप की घोड़ी l
2।